UP BOARD CLASS 10 HINDI • SESSION 2026–27
अध्याय 5 : स्वदेश प्रेम
रामनरेश त्रिपाठी
काव्य-खंड • सम्पूर्ण समाधान
📚 अध्याय परिचय
‘स्वदेश प्रेम’ राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत कविता है। इसमें
कवि रामनरेश त्रिपाठी ने भारत के गौरवशाली अतीत, पूर्वजों के पराक्रम,
मातृभूमि के प्रति प्रेम तथा देश के लिए त्याग और बलिदान की भावना को
प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।
कवि के अनुसार सच्चा देश-प्रेम केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए,
बल्कि आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य को अपनी मातृभूमि के लिए त्याग और
आत्मसमर्पण के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
✍️ कवि रामनरेश त्रिपाठी का जीवन-परिचय
| बिंदु |
विवरण |
| नाम |
पं. रामनरेश त्रिपाठी |
| जन्म |
4 मार्च 1889 ई. |
| जन्म-स्थान |
कोइरीपुर, जिला जौनपुर, उत्तर प्रदेश |
| पिता |
पं. रामदत्त त्रिपाठी |
| शिक्षा |
लगभग नवीं कक्षा तक औपचारिक शिक्षा; बाद में स्वाध्याय एवं देशाटन से ज्ञान-विस्तार |
| भाषाज्ञान |
हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, बंगला तथा गुजराती |
| मृत्यु |
1962 ई. |
👨👦 माता-पिता
रामनरेश त्रिपाठी के पिता का नाम पं. रामदत्त त्रिपाठी था।
वे धार्मिक एवं कर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। उपलब्ध प्रमाणिक जीवन-वृत्तों में
माता के नाम की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती, इसलिए परीक्षा की तैयारी में
माता का अप्रमाणित नाम लिखना उचित नहीं है।
🎓 शिक्षा-दीक्षा
त्रिपाठी जी की प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव में हुई। इसके बाद उन्होंने
जौनपुर में आगे की पढ़ाई की, लेकिन औपचारिक शिक्षा नवीं कक्षा के बाद
जारी नहीं रह सकी। इसके पश्चात उन्होंने स्वाध्याय, अध्ययन और देशाटन के
माध्यम से अपने ज्ञान का विस्तार किया।
📖 साहित्यिक परिचय
रामनरेश त्रिपाठी बहुमुखी प्रतिभा वाले साहित्यकार थे। उन्होंने कविता,
खंडकाव्य, कहानी, नाटक, आलोचना तथा लोकगीत-संग्रह जैसे विभिन्न क्षेत्रों
में साहित्य-सृजन किया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय भावना, मानव-सेवा,
प्रेम, प्रकृति और लोकजीवन के स्वर प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं।
📚 प्रमुख रचनाएँ
- खंडकाव्य: पथिक, मिलन, स्वप्न
- कहानी: स्वप्नों के चित्र आदि
- नाटक: सुभद्रा, जयन्त आदि
- अन्य साहित्य: ग्राम्य गीत, कविता कौमुदी आदि
- आलोचना: गोस्वामी तुलसीदास और उनका काव्य
🌟 साहित्यिक विशेषताएँ
- राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की भावना
- मानव-सेवा एवं त्याग का संदेश
- प्रकृति एवं ग्रामीण जीवन का चित्रण
- सरल एवं प्रभावशाली खड़ीबोली
- ओज, भावुकता और चित्रात्मकता
- लोकजीवन से निकट संबंध
⭐ परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष:
रामनरेश त्रिपाठी राष्ट्रीय चेतना, मानवता, प्रेम और लोकजीवन के कवि हैं।
उनकी रचनाओं में देश के प्रति समर्पण तथा त्याग की भावना विशेष रूप से
प्रकट होती है।
🇮🇳 पद्यांश 1 — भारत के गौरव का वर्णन
अतुलनीय जिनके प्रताप का,
साक्षी है प्रत्यक्ष दिवाकर।
घूम-घूम कर देख चुका है,
जिनकी निर्मल कीर्ति निशाकर।
देख चुके हैं जिनका वैभव,
ये नभ के अनन्त तारागण।
अगणित बार सुन चुका है नभ,
जिनका विजय-घोष रण-गर्जन।।
🔤 शब्दार्थ
- अतुलनीय — जिसकी तुलना न की जा सके
- प्रताप — शौर्य, पराक्रम
- दिवाकर — सूर्य
- निशाकर — चन्द्रमा
- वैभव — ऐश्वर्य, गौरव
- नभ — आकाश
- तारागण — तारों का समूह
- रण-गर्जन — युद्ध की गर्जना
📌 संदर्भ
प्रस्तुत पद्यांश कवि रामनरेश त्रिपाठी की राष्ट्रीय भावना
से युक्त कविता ‘स्वदेश प्रेम’ से लिया गया है।
📌 प्रसंग
इन पंक्तियों में कवि भारत के गौरवशाली अतीत और उसके महान पूर्वजों के
अद्भुत पराक्रम का स्मरण कराते हुए देशवासियों में राष्ट्रीय गौरव की
भावना जगाता है।
📝 सरल भावार्थ
कवि कहता है कि हमारे देश का गौरव और उसके पूर्वजों का पराक्रम इतना
महान रहा है कि सूर्य स्वयं उसका साक्षी है। चन्द्रमा ने भी पृथ्वी का
भ्रमण करते हुए हमारे देश की निर्मल कीर्ति को देखा है। आकाश के असंख्य
तारों ने भारत के वैभव को देखा है और आकाश ने अनेक बार हमारे वीरों की
विजय-घोष से उत्पन्न युद्ध-गर्जना सुनी है।
🎨 काव्य-सौंदर्य
- भारत के गौरवशाली अतीत का वर्णन।
- राष्ट्रीय गौरव एवं देशप्रेम की भावना।
- सूर्य, चन्द्रमा और तारों को साक्षी बनाकर प्रभाव उत्पन्न किया गया है।
- भाषा ओजपूर्ण एवं प्रभावशाली है।
- रस — वीर रस
- गुण — ओज
- अनुप्रास आदि अलंकारों का प्रभावपूर्ण प्रयोग।
🏔️ पद्यांश 2 — भारत की महानता
शोभित है सर्वोच्च मुकुट से,
जिनके दिव्य देश का मस्तक।
गूँज रही हैं सकल दिशाएँ,
जिनके जय-गीतों से अब तक।।
जिनकी महिमा का है अविरल,
साक्षी सत्यरूप हिमगिरि-वर।
उतरा करते थे विमान-दल,
जिसके विस्तृत वक्षःस्थल पर।।
🔤 शब्दार्थ
- सर्वोच्च — सबसे ऊँचा
- मुकुट — सिर पर धारण किया जाने वाला आभूषण
- मस्तक — सिर
- सकल — सभी
- अविरल — निरन्तर
- हिमगिरि — हिमालय
- वक्षःस्थल — छाती का भाग
- विमान-दल — विमानों का समूह
📌 संदर्भ एवं प्रसंग
कवि भारत के गौरवपूर्ण स्वरूप और उसके प्राकृतिक मुकुट हिमालय के माध्यम
से देश की महानता का चित्रण करता है।
📝 सरल भावार्थ
कवि कहता है कि भारत का मस्तक हिमालय जैसे सर्वोच्च पर्वत के रूप में
सुंदर मुकुट से सुशोभित है। भारत की महानता और उसके पूर्वजों की कीर्ति
का गुणगान आज भी चारों दिशाओं में सुनाई देता है। हिमालय स्वयं भारत की
महिमा का प्रमाण है। कवि कल्पना करता है कि प्राचीन समय में हिमालय की
विस्तृत पर्वतीय भूमि पर विमानों का आवागमन भी हुआ करता था।
🎨 काव्य-सौंदर्य
- हिमालय को भारत के मस्तक के मुकुट के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- भारत की प्राचीन समृद्धि एवं गौरव का वर्णन।
- भाषा ओजपूर्ण और चित्रात्मक है।
- देशप्रेम एवं गौरव की भावना प्रमुख है।
🌊 पद्यांश 3 — भारत की समृद्धि और पूर्वजों का गौरव
सागर निज छाती पर जिनके,
अगणित अर्णव-पोत उठाकर।
पहुँचाया करता था प्रमुदित,
भूमण्डल के सकल तटों पर।।
नदियाँ जिसकी यश-धारा-सी,
बहती हैं अब भी निशि-वासर।
ढूँढो, उनके चरण-चिह्न भी,
पाओगे तुम इनके तट पर।।
🔤 शब्दार्थ
- अर्णव — समुद्र
- पोत — जहाज
- प्रमुदित — प्रसन्न
- भूमण्डल — पृथ्वी
- सकल — समस्त
- यश-धारा — कीर्ति की धारा
- निशि-वासर — रात-दिन
- चरण-चिह्न — पैरों के निशान
📌 संदर्भ
यह पद्यांश ‘स्वदेश प्रेम’ कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने भारत के
प्राचीन गौरव तथा पूर्वजों की उपलब्धियों का स्मरण कराया है।
📌 प्रसंग
कवि भारत की प्राचीन व्यापारिक एवं सांस्कृतिक समृद्धि को याद करते हुए
बताता है कि हमारे पूर्वजों का प्रभाव दूर-दूर तक था।
📝 सरल भावार्थ
कवि कहता है कि प्राचीन समय में समुद्र हमारे पूर्वजों के अनगिनत जहाजों
को अपनी छाती पर लेकर प्रसन्नता से संसार के विभिन्न तटों तक पहुँचाता था।
भारत की नदियाँ आज भी रात-दिन बहती हुई ऐसी प्रतीत होती हैं मानो वे
हमारे पूर्वजों की कीर्ति का संदेश सुना रही हों। यदि कोई व्यक्ति इन
नदियों के किनारे खोजे तो उसे प्राचीन गौरव के अनेक चिह्न मिल सकते हैं।
🎨 काव्य-सौंदर्य
- भारत की प्राचीन समृद्धि का चित्रण।
- समुद्र और नदियों का मानवीकरणात्मक चित्रण।
- राष्ट्रीय गौरव की भावना।
- भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और ओजस्वी है।
🌍 पद्यांश 4 — मातृभूमि के प्रति प्रेम
विषुवत् रेखा का वासी जो,
जीता है नित हाँफ-हाँफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक,
वह भी अपनी मातृभूमि पर।।
ध्रुव-वासी, जो हिम में तम में,
जी लेता है काँप-काँप कर।
वह भी अपनी मातृभूमि पर,
कर देता है प्राण निछावर।।
🔤 शब्दार्थ
- विषुवत् रेखा — भूमध्य रेखा
- वासी — रहने वाला
- अनुराग — प्रेम
- अलौकिक — असाधारण, दिव्य
- ध्रुव-वासी — ध्रुव प्रदेश में रहने वाला
- तम — अन्धकार
- प्राण निछावर — जीवन अर्पित करना
📌 संदर्भ एवं प्रसंग
कवि संसार के अलग-अलग जलवायु वाले क्षेत्रों में रहने वाले मनुष्यों के
मातृभूमि-प्रेम का उदाहरण देकर देशप्रेम की सार्वभौमिक भावना को व्यक्त
करता है।
📝 सरल भावार्थ
कवि कहता है कि भूमध्य रेखा के निकट रहने वाला मनुष्य अत्यधिक गर्मी के
कारण कठिन जीवन जीता है, फिर भी उसे अपनी मातृभूमि से असाधारण प्रेम
रहता है। दूसरी ओर ध्रुवीय प्रदेश में रहने वाला व्यक्ति अत्यधिक ठंड,
बर्फ और अन्धकार के बीच जीवन बिताता है, फिर भी वह अपनी मातृभूमि के लिए
अपना जीवन तक समर्पित करने को तैयार रहता है।
इस प्रकार कवि बताता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों,
मातृभूमि के प्रति प्रेम मनुष्य के हृदय में बना रहता है।
🕊️ पद्यांश 5 — मृत्यु से निर्भय रहने का संदेश
निर्भय स्वागत करो मृत्यु का,
मृत्यु एक है विश्राम-स्थल।
जीव जहाँ से फिर चलता है,
धारण कर नव जीवन-संबल।।
मृत्यु एक सरिता है, जिसमें,
श्रम से कातर जीव नहाकर।
फिर नूतन धारण करता है,
काया-रूपी वस्त्र बहाकर।।
🔤 शब्दार्थ
- निर्भय — बिना भय के
- विश्राम-स्थल — आराम करने का स्थान
- संबल — सहारा
- सरिता — नदी
- कातर — दुःखी, व्याकुल
- नूतन — नया
- काया — शरीर
📌 संदर्भ एवं प्रसंग
इन पंक्तियों में कवि देश की रक्षा और मातृभूमि के लिए बलिदान की भावना
को महत्त्व देता है। वह मृत्यु के भय से ऊपर उठकर कर्तव्य निभाने की
प्रेरणा देता है।
📝 सरल भावार्थ
कवि कहता है कि मृत्यु से भयभीत नहीं होना चाहिए। मृत्यु को एक विश्राम
के स्थान के रूप में देखा जा सकता है, जिसके बाद जीव नए जीवन की यात्रा
आरम्भ करता है। कवि मृत्यु की तुलना नदी से करता है। जैसे नदी में स्नान
करने के बाद मनुष्य स्वयं को नया और स्वच्छ अनुभव करता है, वैसे ही मृत्यु
के बाद जीव पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करता है।
इन विचारों के माध्यम से कवि देश के लिए निर्भय होकर कर्तव्य निभाने तथा
आवश्यकता पड़ने पर बलिदान के लिए तैयार रहने की प्रेरणा देता है।
🎨 काव्य-सौंदर्य
- मृत्यु के प्रति निर्भयता का भाव।
- देश के लिए त्याग और बलिदान की प्रेरणा।
- मृत्यु को विश्राम-स्थल और सरिता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- रस — वीर रस
- गुण — ओज
❤️ पद्यांश 6 — सच्चे प्रेम और देश-प्रेम का स्वरूप
सच्चा प्रेम वही है जिसकी,
तृप्ति आत्म-बलि पर हो निर्भर।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है,
करो प्रेम पर प्राण निछावर।।
देश-प्रेम वह पुण्य-क्षेत्र है,
अमल असीम त्याग से विलसित।
आत्मा के विकास से जिसमें,
मनुष्यता होती है विकसित।।
🔤 शब्दार्थ
- तृप्ति — संतोष
- आत्म-बलि — स्वयं का समर्पण
- निष्प्राण — प्राणरहित, निर्जीव
- निछावर — अर्पित करना
- पुण्य-क्षेत्र — पवित्र क्षेत्र
- अमल — निर्मल, शुद्ध
- विलसित — शोभायमान
- मनुष्यता — मानवता
📌 संदर्भ
प्रस्तुत पद्यांश कवि रामनरेश त्रिपाठी की राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत
कविता ‘स्वदेश प्रेम’ से लिया गया है।
📌 प्रसंग
कवि इस पद्यांश में सच्चे प्रेम और सच्चे देशप्रेम की कसौटी बताते हुए
त्याग, आत्मसमर्पण और मानवता के विकास को आवश्यक मानता है।
📝 सरल भावार्थ
कवि के अनुसार सच्चा प्रेम वही है जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर
उठकर प्रिय के लिए त्याग करने को तैयार हो। त्याग के बिना प्रेम केवल
नाममात्र का और निर्जीव हो जाता है। इसलिए सच्चे प्रेम के लिए अपना
सर्वस्व अर्पित करने की भावना होनी चाहिए।
कवि कहता है कि देशप्रेम एक पवित्र भावना है। जब मनुष्य निर्मल एवं
असीम त्याग की भावना से मातृभूमि की सेवा करता है, तब उसके व्यक्तित्व
का विकास होता है और उसके भीतर वास्तविक मानवता विकसित होती है।
🎨 काव्य-सौंदर्य
- सच्चे प्रेम को त्याग से जोड़ा गया है।
- देशप्रेम को मानवता के विकास का आधार माना गया है।
- भाषा सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली है।
- रस — वीर रस
- गुण — ओज
- अलंकार — अनुप्रास का प्रभावपूर्ण प्रयोग।
🎨 सम्पूर्ण काव्य-सौंदर्य
🔹 भाषा
कविता की भाषा मुख्यतः साहित्यिक खड़ीबोली है। भाषा सरल, स्पष्ट,
प्रवाहपूर्ण, ओजपूर्ण तथा भावानुकूल है।
🔹 शैली
कविता में वर्णनात्मक, भावात्मक तथा उपदेशात्मक शैली का सुंदर समन्वय
मिलता है।
🔹 रस
कविता में प्रमुख रूप से वीर रस की अभिव्यक्ति हुई है।
इसके साथ देशप्रेम और त्याग की भावनाएँ भी प्रमुख हैं।
🔹 गुण
कविता में मुख्यतः ओज गुण दिखाई देता है।
🔹 प्रमुख अलंकार
- अनुप्रास
- रूपक
- उपमा
- मानवीकरण आदि का प्रसंगानुकूल प्रयोग
🔹 प्रमुख भाव
- देशप्रेम
- राष्ट्रीय गौरव
- त्याग
- बलिदान
- मातृभूमि के प्रति समर्पण
- मानवता
📝 बोर्ड परीक्षा के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. ‘स्वदेश प्रेम’ कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर: ‘स्वदेश प्रेम’ कविता के कवि रामनरेश त्रिपाठी हैं।
प्रश्न 2. रामनरेश त्रिपाठी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: रामनरेश त्रिपाठी का जन्म 4 मार्च 1889 ई. को
उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के कोइरीपुर ग्राम में हुआ था।
प्रश्न 3. रामनरेश त्रिपाठी के पिता का नाम क्या था?
उत्तर: उनके पिता का नाम पं. रामदत्त त्रिपाठी था।
प्रश्न 4. रामनरेश त्रिपाठी की शिक्षा कहाँ तक हुई?
उत्तर: उनकी औपचारिक शिक्षा लगभग नवीं कक्षा तक हुई।
इसके बाद उन्होंने स्वाध्याय और देशाटन के माध्यम से अपना ज्ञान बढ़ाया।
प्रश्न 5. रामनरेश त्रिपाठी को किन भाषाओं का ज्ञान था?
उत्तर: उन्हें हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी, संस्कृत, बंगला
और गुजराती भाषाओं का भी ज्ञान था।
प्रश्न 6. ‘स्वदेश प्रेम’ कविता का मूल संदेश क्या है?
उत्तर: कविता का मूल संदेश यह है कि मनुष्य को अपनी
मातृभूमि से सच्चा प्रेम करना चाहिए तथा देश की आवश्यकता पड़ने पर
त्याग और बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए।
प्रश्न 7. कवि ने भारत के गौरव का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर: कवि ने सूर्य, चन्द्रमा, तारों, हिमालय, समुद्र और
नदियों को भारत की महानता का साक्षी बताते हुए उसके गौरवशाली अतीत का
चित्रण किया है। वह भारत के पूर्वजों के पराक्रम और समृद्धि का स्मरण
कराता है।
प्रश्न 8. कवि ने विषुवत् रेखा और ध्रुव प्रदेश के निवासियों का उदाहरण
क्यों दिया है?
उत्तर: कवि यह बताना चाहता है कि मनुष्य चाहे अत्यधिक
गर्मी वाले क्षेत्र में रहे या अत्यधिक ठंडे प्रदेश में, उसे अपनी
मातृभूमि से प्रेम रहता है। इससे देशप्रेम की सार्वभौमिक भावना स्पष्ट
होती है।
प्रश्न 9. कवि मृत्यु को किस रूप में देखता है?
उत्तर: कवि मृत्यु को एक विश्राम-स्थल और सरिता के रूप
में देखता है। उसके अनुसार मृत्यु के बाद जीव नए जीवन के लिए आगे बढ़ता
है। इसलिए देश के लिए कर्तव्य निभाते समय मृत्यु से भयभीत नहीं होना चाहिए।
प्रश्न 10. सच्चे प्रेम की क्या पहचान है?
उत्तर: सच्चे प्रेम की पहचान त्याग और आत्मसमर्पण है।
जिस प्रेम में त्याग की भावना नहीं होती, उसे कवि निष्प्राण प्रेम मानता है।
प्रश्न 11. देश-प्रेम को पुण्य-क्षेत्र क्यों कहा गया है?
उत्तर: देश-प्रेम मनुष्य को स्वार्थ से ऊपर उठाकर त्याग,
सेवा और समर्पण की ओर ले जाता है। इससे व्यक्ति के चरित्र और आत्मा का
विकास होता है तथा उसमें मानवता मजबूत होती है। इसलिए कवि ने
देश-प्रेम को पवित्र पुण्य-क्षेत्र कहा है।
प्रश्न 12. ‘स्वदेश प्रेम’ कविता की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: कविता की भाषा साहित्यिक खड़ीबोली है। भाषा सरल,
प्रवाहपूर्ण, ओजपूर्ण और प्रभावशाली है। शैली वर्णनात्मक, भावात्मक तथा
उपदेशात्मक है। कविता में देशप्रेम, त्याग और बलिदान की भावना को
प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
प्रश्न 13. रामनरेश त्रिपाठी की प्रमुख रचनाएँ लिखिए।
उत्तर: उनकी प्रमुख रचनाओं में पथिक, मिलन,
स्वप्न, ग्राम्य गीत, कविता कौमुदी, सुभद्रा, जयन्त आदि का
उल्लेख किया जाता है।
प्रश्न 14. ‘स्वदेश प्रेम’ कविता में कौन-सा रस प्रमुख है?
उत्तर: कविता में प्रमुख रूप से वीर रस
की अभिव्यक्ति हुई है।
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| बिंदु |
याद रखें |
| कवि |
रामनरेश त्रिपाठी |
| जन्म |
4 मार्च 1889 ई. |
| जन्म-स्थान |
कोइरीपुर, जौनपुर |
| पिता |
पं. रामदत्त त्रिपाठी |
| शिक्षा |
नवीं कक्षा तक; आगे स्वाध्याय |
| काव्यभाषा |
साहित्यिक खड़ीबोली |
| प्रमुख रस |
वीर रस |
| प्रमुख गुण |
ओज |
| मुख्य संदेश |
देशप्रेम, त्याग और बलिदान |
| मृत्यु |
1962 ई. |
📚 UP Board Class 10 Hindi 2026–27
अध्याय 5 — स्वदेश प्रेम | रामनरेश त्रिपाठी
संदर्भ • प्रसंग • भावार्थ • काव्य-सौंदर्य • प्रश्न-उत्तर
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