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कक्षा-10 (हिन्दी) - काव्य खण्ड : Chapter-4 - बिहारीलाल - भक्ति एवं नीति

UP BOARD CLASS 10 HINDI • SESSION 2026–27

अध्याय 4 : बिहारीलाल

भक्ति एवं नीति
काव्य-खंड • सम्पूर्ण बोर्ड परीक्षा समाधान

📚 अध्याय परिचय

‘बिहारीलाल — भक्ति एवं नीति’ काव्य-खंड का महत्वपूर्ण पाठ है। इसमें रीतिकालीन कवि बिहारीलाल के ऐसे दोहे संकलित हैं जिनमें भक्ति, ईश्वर-प्रेम, मन की निर्मलता, नीति, विनम्रता, धन के प्रभाव, मित्रता तथा व्यवहारिक जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश मिलते हैं।

बिहारी की विशेषता यह है कि वे बहुत कम शब्दों में गहरे और व्यापक अर्थ व्यक्त करते हैं। इसी कारण उनके दोहों को प्रायः ‘गागर में सागर’ भरने वाला काव्य कहा जाता है।

⭐ परीक्षा की दृष्टि से विशेष: इस अध्याय में प्रत्येक दोहे के लिए शब्दार्थ, संदर्भ, प्रसंग, भावार्थ/व्याख्या, काव्य-सौंदर्य, रस, छंद और अलंकार को ध्यान से तैयार करें।

✍️ कवि बिहारीलाल का जीवन-परिचय

बिंदु विवरण
नाम बिहारीलाल
जन्म लगभग 1603 ई.
जन्म-स्थान बसुआ गोविंदपुर, ग्वालियर के निकट
पिता केशवराय
शिक्षा-दीक्षा स्वामी नरहरिदास से संस्कृत, प्राकृत आदि का अध्ययन किया।
सम्बन्धित स्थान मथुरा, आगरा तथा जयपुर
आश्रयदाता जयपुर के राजा जयसिंह
प्रमुख रचना बिहारी सतसई
मृत्यु लगभग 1663 ई.

👨‍👩‍👦 माता-पिता

बिहारीलाल के पिता का नाम केशवराय माना जाता है। उनके पिता के संबंध में उपलब्ध जीवन-वृत्तों में यही नाम प्रमुख रूप से मिलता है। माता के नाम की प्रमाणिक और सर्वमान्य जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण परीक्षा में अप्रमाणित नाम लिखना उचित नहीं है।

🎓 शिक्षा-दीक्षा

बिहारीलाल ने संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं एवं साहित्य का अध्ययन किया। उनकी शिक्षा-दीक्षा पर स्वामी नरहरिदास का प्रभाव माना जाता है। बिहारी ने अध्ययन, साहित्यिक साधना तथा तत्कालीन दरबारी वातावरण के माध्यम से अपने काव्य-ज्ञान को समृद्ध किया।

🏛️ दरबारी जीवन

बिहारी का सम्बन्ध मथुरा और आगरा से रहा। बाद में वे जयपुर के राजा जयसिंह के दरबार से जुड़े। राजा जयसिंह को कर्तव्य की ओर प्रेरित करने वाला प्रसिद्ध दोहा बिहारी की व्यावहारिक बुद्धि और काव्य-कौशल का उदाहरण माना जाता है।

📖 साहित्यिक परिचय

बिहारी रीतिकाल के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। वे विशेष रूप से अपने संक्षिप्त, अर्थगर्भित और कलात्मक दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके काव्य में श्रृंगार के साथ-साथ भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन की भावनाएँ भी मिलती हैं।

📚 प्रमुख रचना

बिहारी सतसई — बिहारी की प्रमुख एवं प्रसिद्ध कृति है। इसमें अनेक दोहों के माध्यम से श्रृंगार, भक्ति, नीति और जीवन के विविध पक्षों का चित्रण मिलता है।

🌟 साहित्यिक विशेषताएँ

  • संक्षिप्तता में व्यापक अर्थ
  • ‘गागर में सागर’ जैसी अर्थ-गहनता
  • ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग
  • भक्ति एवं नीति के प्रभावशाली विचार
  • श्रृंगारिक सौंदर्य का चित्रण
  • अलंकारों का प्रभावपूर्ण प्रयोग
  • चित्रात्मकता एवं कल्पनाशीलता
  • व्यावहारिक जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति

🙏 भाग–1 : भक्ति

बिहारीलाल के भक्ति-प्रधान दोहे
दोहा 1

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाँई परै, स्यामु हरित-दुति होइ।।

🔤 शब्दार्थ

  • भव-बाधा — संसार के कष्ट/बंधन
  • हरौ — दूर करो
  • नागरि — चतुर, कुशल
  • झाँई — छाया/झलक
  • स्यामु — श्रीकृष्ण
  • हरित-दुति — हरी आभा/कांति

📌 संदर्भ

प्रस्तुत दोहा रीतिकालीन कवि बिहारीलाल की प्रसिद्ध कृति ‘बिहारी सतसई’ के भक्ति-प्रधान अंश से लिया गया है।

📌 प्रसंग

इस दोहे में कवि राधा जी की वंदना करते हुए उनसे अपने सांसारिक कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करता है।

📝 सरल भावार्थ

कवि राधा जी से प्रार्थना करता है कि वे उसके सांसारिक दुखों और बाधाओं को दूर करें। कवि ने राधा जी की गौर आभा और श्रीकृष्ण के श्याम वर्ण के मिलन से हरे रंग की कल्पना की है। इस रंग-कल्पना के माध्यम से कवि राधा की शक्ति और महिमा को व्यक्त करता है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • राधा की वंदना द्वारा भक्तिभाव व्यक्त हुआ है।
  • रंगों के संयोजन की सुंदर कल्पना है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • शैली — मुक्तक
  • रस — भक्ति एवं श्रृंगार
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — श्लेष एवं अनुप्रास
  • गुण — माधुर्य एवं प्रसाद
दोहा 2

मोर-मुकुट की चंद्रिकनु, यौं राजत नंदनंद।
मनु ससि सेखर की अकस, किय सेखर सत चंद।।

🔤 शब्दार्थ

  • मोर-मुकुट — मोरपंखों का मुकुट
  • चंद्रिकनु — चंद्राकार चमकीले भाग
  • नंदनंद — नंद के पुत्र श्रीकृष्ण
  • ससि — चंद्रमा
  • सेखर — सिर पर धारण करने वाला
  • अकस — प्रतिस्पर्धा/प्रतिद्वंद्विता

📌 संदर्भ

यह दोहा बिहारीलाल की ‘बिहारी सतसई’ के भक्ति-प्रधान अंश से लिया गया है।

📌 प्रसंग

कवि ने श्रीकृष्ण के सिर पर सुशोभित मोर-मुकुट की सुंदरता का वर्णन करते हुए उसमें दिखाई देने वाली चंद्राकार आकृतियों की कल्पना की है।

📝 सरल भावार्थ

श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंखों का मुकुट अत्यंत सुंदर दिखाई देता है। मोरपंखों में बनी चंद्राकार आकृतियाँ ऐसी लगती हैं मानो श्रीकृष्ण ने भगवान शिव से सौंदर्य की होड़ करने के लिए अपने सिर पर अनेक चंद्रमा धारण कर लिए हों।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • श्रीकृष्ण के सौंदर्य का मनोहारी चित्रण।
  • मोर-मुकुट और चंद्रमा की सुंदर कल्पना।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — श्रृंगार
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अनुप्रास, उत्प्रेक्षा एवं श्लेष
  • गुण — माधुर्य
दोहा 3

सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात।।

🔤 शब्दार्थ

  • सोहत — शोभित होना
  • पीतु पटु — पीले वस्त्र
  • स्याम — श्याम वर्ण
  • सलौने — सुंदर
  • गात — शरीर
  • नीलमनि-सैल — नीलमणि का पर्वत
  • आतपु — सूर्य का प्रकाश

📌 संदर्भ एवं प्रसंग

प्रस्तुत दोहे में कवि ने पीले वस्त्र धारण किए हुए श्रीकृष्ण के श्याम शरीर की सुंदरता का चित्रण किया है।

📝 सरल भावार्थ

श्रीकृष्ण का श्याम शरीर पीले वस्त्रों में अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है। कवि को ऐसा प्रतीत होता है मानो नीलमणि से बने पर्वत पर प्रातःकाल की स्वर्णिम धूप पड़ रही हो। इस उपमा से श्रीकृष्ण के श्याम शरीर और पीले वस्त्रों का मनोहारी रंग-संयोजन सामने आता है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • श्याम शरीर और पीले वस्त्रों का सुंदर रंग-संयोजन।
  • नीलमणि पर्वत और प्रातःकालीन धूप की कल्पना।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — श्रृंगार एवं भक्ति
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अनुप्रास एवं उत्प्रेक्षा
  • गुण — माधुर्य
दोहा 4

अधर धरत हरि कै परत, ओठ-डीठि-पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष-हँग होति।।

🔤 शब्दार्थ

  • अधर — होंठ
  • डीठि — दृष्टि
  • पट — वस्त्र
  • जोति — कांति/प्रकाश
  • हरित — हरा
  • बाँसुरी — मुरली

📌 प्रसंग

कवि ने श्रीकृष्ण द्वारा बजाई जा रही हरे रंग की बाँसुरी पर पड़ने वाले विभिन्न रंगों के प्रभाव का सुंदर चित्रण किया है।

📝 सरल भावार्थ

जब श्रीकृष्ण हरे रंग की बाँसुरी को अपने लाल होंठों से लगाकर बजाते हैं, तब उनके शरीर के श्याम रंग, वस्त्रों के पीले रंग और दृष्टि की उज्ज्वल कांति का प्रभाव बाँसुरी पर पड़ता है। इससे बाँसुरी अनेक रंगों से युक्त होकर इन्द्रधनुष जैसी दिखाई देने लगती है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • रंगों के अद्भुत संयोजन का चित्रण।
  • श्रीकृष्ण की मनोहारी छवि प्रस्तुत की गई है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — भक्ति
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अनुप्रास, यमक एवं उपमा
  • गुण — प्रसाद
दोहा 5

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई।
ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रँग, त्यों-त्यों उज्जलु होई।।

🔤 शब्दार्थ

  • अनुरागी — प्रेम में डूबा हुआ
  • चित्त — मन
  • गति — दशा
  • स्याम रंग — श्रीकृष्ण की भक्ति का रंग
  • उज्जलु — उज्ज्वल, निर्मल

📌 प्रसंग

कवि श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबे हुए मन की विचित्र स्थिति का वर्णन करता है।

📝 सरल भावार्थ

कवि कहता है कि श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबे हुए मन की दशा को कोई सामान्य व्यक्ति नहीं समझ सकता। संसार में किसी काले रंग में डूबने पर वस्तु काली हो जाती है, लेकिन कृष्ण के श्याम रंग अर्थात उनकी भक्ति में मन जितना अधिक डूबता है, उतना ही वह पवित्र और निर्मल होता जाता है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • कृष्ण-भक्ति से मन के शुद्ध होने का संदेश।
  • श्याम रंग और उज्ज्वलता का विरोधाभासी प्रयोग।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत/भक्ति
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — श्लेष, पुनरुक्तिप्रकाश एवं विरोधाभास
  • गुण — माधुर्य
दोहा 6

तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आवै किहिं बाट।
विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट।।

🔤 शब्दार्थ

  • मन-सदन — मन रूपी घर
  • हरि — भगवान
  • बाट — मार्ग
  • विकट — कठिन/मजबूत
  • कपट-कपाट — कपट के किवाड़
  • खुटै — खुलें/समाप्त हों

📌 प्रसंग

कवि बताता है कि ईश्वर को अपने हृदय में स्थान देने के लिए मन से कपट और छल को दूर करना आवश्यक है।

📝 सरल भावार्थ

मनुष्य का मन एक घर के समान है। जब तक उस घर के द्वार कपट और छल के कारण बंद हैं, तब तक भगवान उसमें प्रवेश कैसे कर सकते हैं? अतः यदि मनुष्य ईश्वर को अपने हृदय में बसाना चाहता है तो उसे अपने मन से छल-कपट दूर करके उसे निर्मल बनाना होगा।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • मन को घर और कपट को उसके किवाड़ के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • निर्मल मन को ईश्वर-प्राप्ति का आधार माना गया है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — भक्ति
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — रूपक एवं अनुप्रास
  • गुण — प्रसाद
दोहा 7

जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाँहि।
ज्यौं आँखिनु सबु देखिये, आँखि न देखी जाँहि।।

🔤 शब्दार्थ

  • जगतु — संसार
  • जनायौ — ज्ञान कराया/दिखाया
  • सकलु — सम्पूर्ण
  • हरि — ईश्वर
  • जान्यौ — जाना/पहचाना

📌 प्रसंग

कवि मनुष्य की उस विडंबना को बताता है कि वह संसार की अनेक वस्तुओं को जानता है, लेकिन उस ईश्वर को भूल जाता है जिसने उसे संसार का ज्ञान दिया है।

📝 सरल भावार्थ

जिस ईश्वर ने मनुष्य को पूरे संसार का ज्ञान कराया और उसे देखने-समझने की शक्ति दी, मनुष्य उसी ईश्वर को नहीं पहचानता। कवि उदाहरण देता है कि हमारी आँखें संसार की सभी वस्तुओं को देख सकती हैं, लेकिन अपनी ही आँखों को सीधे नहीं देख सकतीं। इसी प्रकार मनुष्य संसार को जानता है, पर उस परम सत्ता को भूल जाता है जो उसके ज्ञान का मूल आधार है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • ईश्वर की महत्ता का प्रभावशाली प्रतिपादन।
  • आँख का सुंदर दृष्टांत दिया गया है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत/भक्ति
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अनुप्रास एवं दृष्टांत
  • गुण — प्रसाद
दोहा 8

जप, माला, छापा, तिलक, सरै न एकौ कामु।
मन-काँचै नाचे वृथा, साँचे राँचे रामु।।

🔤 शब्दार्थ

  • जप — मंत्र का जाप
  • माला — जपमाला
  • छापा — धार्मिक चिह्न
  • तिलक — माथे पर लगाया जाने वाला धार्मिक चिह्न
  • मन-काँचै — अपरिपक्व/अशुद्ध मन
  • वृथा — व्यर्थ
  • साँचे — सच्चे
  • राँचे — प्रसन्न होते हैं

📌 प्रसंग

कवि बाहरी धार्मिक आडंबरों की अपेक्षा मन की सच्चाई और निर्मलता को अधिक महत्वपूर्ण बताता है।

📝 सरल भावार्थ

केवल माला फेरने, जप करने, धार्मिक चिह्न लगाने या तिलक लगाने से ईश्वर की सच्ची प्राप्ति नहीं हो सकती। यदि मन में छल, कपट और अशुद्ध भावनाएँ हैं तो ये बाहरी क्रियाएँ व्यर्थ हैं। भगवान उसी व्यक्ति से प्रसन्न होते हैं जिसका मन सच्चा और निर्मल होता है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • बाह्याडंबर के स्थान पर सच्ची भक्ति का संदेश।
  • मन की पवित्रता को भक्ति का आधार बनाया गया है।
  • भाषा — साहित्यिक ब्रजभाषा
  • रस — शांत/भक्ति
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अनुप्रास
  • गुण — प्रसाद

🧠 भाग–2 : नीति

बिहारीलाल के नीति-प्रधान दोहे
दोहा 1

दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यौं न बढ़े दुख-दंदु।
अधिक अँधेरी जग करत, मिलि मावस रबि-चंदु।।

🔤 शब्दार्थ

  • दुसह — असहनीय
  • दुराज — दो राजाओं का शासन/दुहरा शासन
  • प्रजानु — प्रजा
  • दुख-दंदु — दुख और संघर्ष
  • मावस — अमावस्या
  • रबि — सूर्य
  • चंदु — चंद्रमा

📌 प्रसंग

कवि दुहरे शासन से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों को अमावस्या के अंधकार के उदाहरण द्वारा स्पष्ट करता है।

📝 सरल भावार्थ

जिस प्रकार अमावस्या के समय सूर्य और चंद्रमा का एक साथ एक ही दिशा में होना संसार को और अधिक अंधकारमय प्रतीत कराता है, उसी प्रकार एक ही राज्य में दो शासकों का अधिकार प्रजा के लिए अत्यधिक कष्टदायक होता है। ऐसे शासन में प्रजा के दुख और संघर्ष बढ़ जाते हैं।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • दुहरे शासन की समस्या को प्रभावशाली उदाहरण से समझाया गया है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — श्लेष एवं दृष्टांत
  • गुण — प्रसाद
दोहा 2

बसै बुराई जासु तन, ताही कौ सनमानु।
भली-भलौ कहि छोड़िये, खोटें ग्रह जपु दानु।।

🔤 शब्दार्थ

  • बसै बुराई — जिसके अंदर बुराई हो
  • सनमानु — सम्मान
  • भली-भलौ — अच्छे व्यक्ति को
  • खोटे ग्रह — अनिष्टकारी ग्रह
  • जपु — मंत्र-जाप
  • दानु — दान

📌 प्रसंग

कवि समाज के उस व्यवहार पर व्यंग्य करता है जिसमें लोग हानि पहुँचाने वाले व्यक्ति से भय के कारण अधिक सम्मानपूर्वक व्यवहार करते हैं।

📝 सरल भावार्थ

कवि कहता है कि जिस व्यक्ति में दूसरों को नुकसान पहुँचाने की शक्ति होती है, लोग उससे डरकर उसका अधिक सम्मान करते हैं। इसके विपरीत अच्छे और सरल व्यक्ति को सामान्य समझकर लोग विशेष महत्व नहीं देते। कवि ने अनिष्टकारी ग्रहों के उदाहरण से इस व्यवहार को समझाया है— जैसे अशुभ ग्रह से बचने के लिए लोग जप और दान आदि करते हैं।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • समाज के व्यवहार की यथार्थ तस्वीर।
  • अनिष्टकारी ग्रह का उदाहरण प्रभावशाली है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश एवं दृष्टांत
  • गुण — प्रसाद
दोहा 3

नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ।
जेतौ नीचो है चले, तेतौ ऊँचौ होइ।।

🔤 शब्दार्थ

  • नर — मनुष्य
  • नल-नीर — नल का पानी
  • गति — दशा/प्रवृत्ति
  • नीचो — नीचे
  • ऊँचौ — ऊँचा

📌 प्रसंग

इस दोहे में कवि ने विनम्रता के महत्व को नल के पानी के उदाहरण से समझाया है।

📝 सरल भावार्थ

मनुष्य और नल के पानी की गति एक जैसी होती है। नल का पानी जितना नीचे की ओर जाता है, उतना ही दबाव के कारण ऊपर उठता है। इसी प्रकार जो मनुष्य अधिक विनम्र और नम्र होता है, वह जीवन में उतना ही अधिक सम्मान और उन्नति प्राप्त करता है। अतः अहंकार छोड़कर विनम्र रहना उन्नति का मार्ग है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • विनम्रता को उन्नति का आधार बताया गया है।
  • नल के पानी का अत्यंत सरल और प्रभावशाली उदाहरण।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — उपमा, विरोधाभास, दीपक एवं श्लेष
  • गुण — प्रसाद
दोहा 4

बढ़त-बढ़त संपति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाई।
घटत-घटत सु न फिरि घटै, बरु समूल कुम्हिलाई।।

🔤 शब्दार्थ

  • संपति-सलिलु — धनरूपी जल
  • मन-सरोजु — मनरूपी कमल
  • घटत — घटते हुए
  • बरु — बल्कि
  • समूल — जड़ सहित
  • कुम्हिलाई — मुरझा जाना

📌 प्रसंग

कवि धन की वृद्धि और मनुष्य की इच्छाओं के बीच संबंध को कमल और जल के उदाहरण से समझाता है।

📝 सरल भावार्थ

जिस प्रकार तालाब में पानी बढ़ने पर कमल भी फैलता और बढ़ता है, उसी प्रकार धन बढ़ने पर मनुष्य की इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं। लेकिन जब धन कम होने लगता है तो इच्छाएँ उसी अनुपात में कम नहीं होतीं। फलस्वरूप मनुष्य को बहुत अधिक मानसिक कष्ट होता है। इसलिए धन बढ़ने पर अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • धन और इच्छाओं के संबंध को कमल-जल के माध्यम से समझाया गया है।
  • व्यावहारिक जीवन की महत्वपूर्ण नीति दी गई है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — रूपक, अनुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश
  • गुण — प्रसाद
दोहा 5

जौ चाहत, चटकन घटे, मैलौ होइ न मित्त।
रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह-चीकन चित्त।।

🔤 शब्दार्थ

  • चटकन — चमक
  • मित्त — मित्रता
  • रज — धूल
  • राजसु — धन/वैभव से संबंधित रजोगुण
  • नेह — प्रेम
  • चीकन — चिकना
  • चित्त — मन

📌 प्रसंग

कवि सच्ची मित्रता को बनाए रखने के लिए धन और स्वार्थ को मित्रता के बीच न आने देने की सलाह देता है।

📝 सरल भावार्थ

यदि मनुष्य चाहता है कि उसकी मित्रता की चमक और मिठास बनी रहे, तो उसे मित्रता में धन और स्वार्थ को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। प्रेम से चिकना मन यदि धनरूपी धूल के संपर्क में आता है तो वह मैला हो जाता है। इसी प्रकार धन और स्वार्थ के कारण सच्ची मित्रता में दरार पड़ सकती है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • मित्रता में स्वार्थ से बचने की शिक्षा।
  • धन को धूल और प्रेम को चिकनाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — रूपक, अनुप्रास एवं श्लेष
  • गुण — प्रसाद
दोहा 6

बुरी बुराई जौ तजे, तौ चितु खरौ डरातु।
ज्यौं निकलंकु मयंकु लखि, गनैं लोग उतपातु।।

🔤 शब्दार्थ

  • बुराई — दुष्टता
  • चितु — मन
  • खरौ — बहुत अधिक
  • निकलंकु — बिना कलंक का
  • मयंकु — चंद्रमा
  • उतपातु — अनिष्ट/अशुभ घटना

📌 प्रसंग

कवि ऐसे दुष्ट व्यक्ति के संबंध में सावधान करता है जो अचानक अपनी दुष्ट प्रवृत्ति छोड़कर बहुत अच्छा व्यवहार करने लगे।

📝 सरल भावार्थ

यदि कोई अत्यंत दुष्ट व्यक्ति अचानक अपनी बुराई छोड़कर अच्छा व्यवहार करने लगे तो उसके प्रति मन में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। कवि चंद्रमा का उदाहरण देता है कि जिस प्रकार बिना किसी दाग का चंद्रमा असामान्य प्रतीत होकर लोगों में आशंका उत्पन्न कर सकता है, उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति का अचानक पूरी तरह बदल जाना भी संदेह पैदा करता है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • मनुष्य के स्वभाव को व्यवहारिक दृष्टि से समझाया गया है।
  • चंद्रमा का उदाहरण प्रभावशाली है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अनुप्रास एवं दृष्टांत
  • गुण — प्रसाद
दोहा 7

स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा, देखि बिहंग बिचारि।
बाजि पराए पानि परि, हूँ पच्छीनु न मारि।।

🔤 शब्दार्थ

  • स्वारथु — स्वार्थ
  • सुकृतु — पुण्य/अच्छा कार्य
  • श्रम — परिश्रम
  • वृथा — व्यर्थ
  • बिहंग — पक्षी
  • बाजि — बाज पक्षी
  • पानि — हाथ
  • पच्छीनु — पक्षियों/अपने पक्ष वालों को

📌 प्रसंग

इस दोहे में कवि ने बाज पक्षी के माध्यम से अपने आश्रयदाता राजा जयसिंह को अप्रत्यक्ष रूप से सावधान किया है।

📝 सरल भावार्थ

कवि बाज से कहता है कि दूसरे के हाथ में पड़कर अपनी ही जाति के पक्षियों का शिकार करना उचित नहीं है। इससे न तो उसका अपना स्वार्थ पूरा होता है, न कोई पुण्य मिलता है और उसका परिश्रम भी व्यर्थ जाता है। इसी के माध्यम से कवि राजा जयसिंह को संकेत करता है कि किसी दूसरे शासक के कहने पर अपने ही पक्ष के लोगों के विरुद्ध संघर्ष करना उचित नहीं है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • बाज के माध्यम से राजा को अप्रत्यक्ष संदेश दिया गया है।
  • यह अन्योक्ति का सुंदर उदाहरण है।
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • रस — शांत
  • छंद — दोहा
  • अलंकार — अन्योक्ति एवं श्लेष
  • गुण — प्रसाद एवं ओज

🎨 सम्पूर्ण काव्य-सौंदर्य

🔹 भाषा

बिहारी की भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा है। भाषा संक्षिप्त, मधुर, प्रभावशाली और अर्थगर्भित है।

🔹 शैली

बिहारी ने मुख्यतः मुक्तक शैली में दोहे लिखे हैं। प्रत्येक दोहा अपने आप में पूर्ण भाव और विचार व्यक्त करता है।

🔹 छंद

इस पाठ में मुख्यतः दोहा छंद का प्रयोग हुआ है। दोहा चार चरणों वाला मात्रिक छंद है, जिसमें प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।

🔹 रस

  • भक्ति-प्रधान दोहों में भक्ति एवं शांत रस।
  • कृष्ण-सौंदर्य वर्णन में श्रृंगार रस।
  • नीति-प्रधान दोहों में शांत रस की प्रधानता।

🔹 प्रमुख अलंकार

  • अनुप्रास
  • श्लेष
  • उपमा
  • उत्प्रेक्षा
  • रूपक
  • विरोधाभास
  • दृष्टांत
  • अन्योक्ति
  • पुनरुक्तिप्रकाश
  • यमक

🎯 परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रमुख अलंकार

1. श्लेष अलंकार

जब एक ही शब्द से एक से अधिक अर्थ निकलते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। बिहारी के दोहों में यह अलंकार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

2. विरोधाभास अलंकार

जब कथन देखने में विरोधपूर्ण लगे लेकिन वास्तव में उसमें कोई गहरा अर्थ निहित हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।

3. अन्योक्ति अलंकार

जब कवि किसी अप्रस्तुत वस्तु का वर्णन करके वास्तव में किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करता है, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है। ‘बाजि पराए पानि परि...’ इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

4. रूपक अलंकार

जहाँ उपमेय में उपमान का सीधा आरोप किया जाता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। ‘मन-सदन’ और ‘कपट-कपाट’ में इसका सुंदर प्रयोग मिलता है।

📝 बोर्ड परीक्षा के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. बिहारीलाल का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर: बिहारीलाल का जन्म लगभग 1603 ई. में ग्वालियर के निकट बसुआ गोविंदपुर ग्राम में हुआ था।

प्रश्न 2. बिहारीलाल के पिता का नाम क्या था?

उत्तर: बिहारीलाल के पिता का नाम केशवराय था।

प्रश्न 3. बिहारीलाल ने शिक्षा किससे प्राप्त की?

उत्तर: बिहारीलाल ने स्वामी नरहरिदास से संस्कृत, प्राकृत आदि का अध्ययन किया था।

प्रश्न 4. बिहारीलाल की प्रमुख रचना कौन-सी है?

उत्तर: बिहारीलाल की प्रमुख रचना ‘बिहारी सतसई’ है।

प्रश्न 5. बिहारी को ‘गागर में सागर’ भरने वाला कवि क्यों कहा जाता है?

उत्तर: बिहारी ने बहुत छोटे दोहे में अत्यंत गहरे, व्यापक और प्रभावशाली भावों को व्यक्त किया है। कम शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की इसी विशेषता के कारण उन्हें ‘गागर में सागर’ भरने वाला कवि कहा जाता है।

प्रश्न 6. बिहारी की भाषा कौन-सी है?

उत्तर: बिहारी की प्रमुख काव्यभाषा ब्रजभाषा है।

प्रश्न 7. बिहारी के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर: बिहारी के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं— संक्षिप्तता, अर्थगर्भिता, ब्रजभाषा की मधुरता, अलंकारों का सुंदर प्रयोग, श्रृंगार, भक्ति और नीति का चित्रण तथा प्रभावशाली कल्पना।

प्रश्न 8. ‘या अनुरागी चित्त की’ दोहे का मुख्य भाव क्या है?

उत्तर: इस दोहे का मुख्य भाव यह है कि श्रीकृष्ण की भक्ति में मन जितना अधिक डूबता है, वह उतना ही अधिक निर्मल और पवित्र होता जाता है।

प्रश्न 9. ईश्वर को हृदय में बसाने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर: ईश्वर को हृदय में बसाने के लिए मन से छल, कपट, अहंकार और अशुद्ध भावनाओं को दूर करना आवश्यक है। निर्मल और सच्चा मन ही ईश्वर का वास्तविक निवास बन सकता है।

प्रश्न 10. बिहारी ने बाहरी आडंबरों के विषय में क्या कहा है?

उत्तर: बिहारी के अनुसार केवल जप, माला, तिलक आदि बाहरी क्रियाओं से सच्ची भक्ति प्राप्त नहीं होती। भगवान सच्चे, निर्मल और श्रद्धापूर्ण मन से की गई भक्ति से प्रसन्न होते हैं।

प्रश्न 11. ‘नर की अरु नल-नीर की’ दोहे से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर: इस दोहे से शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को विनम्र रहना चाहिए। जैसे नल का पानी नीचे होकर ऊपर उठता है, उसी प्रकार विनम्र व्यक्ति जीवन में सम्मान और उन्नति प्राप्त करता है।

प्रश्न 12. धन बढ़ने पर मनुष्य की इच्छाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: धन बढ़ने पर मनुष्य की इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं। यदि बाद में धन कम हो जाए तो इच्छाएँ उसी गति से कम नहीं होतीं, जिससे मनुष्य को मानसिक कष्ट हो सकता है।

प्रश्न 13. मित्रता में धन को बाधक क्यों माना गया है?

उत्तर: धन और स्वार्थ मित्रता में लोभ तथा अपेक्षा उत्पन्न कर सकते हैं। इससे प्रेम और विश्वास कम हो सकता है। इसलिए सच्ची मित्रता में धन और स्वार्थ को बीच में नहीं आने देना चाहिए।

प्रश्न 14. ‘बाजि पराए पानि परि’ दोहे में बाज किसका प्रतीक है?

उत्तर: दोहे के प्रत्यक्ष अर्थ में बाज एक पक्षी है, लेकिन अन्योक्ति के माध्यम से वह राजा जयसिंह की ओर संकेत करता है।

प्रश्न 15. ‘बाजि पराए पानि परि’ में कवि क्या संदेश देता है?

उत्तर: कवि संदेश देता है कि किसी दूसरे के स्वार्थ के लिए अपने ही पक्ष या अपने लोगों के विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अपने विवेक और हित के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।

प्रश्न 16. बिहारी के नीति-दोहों की प्रमुख विशेषता क्या है?

उत्तर: बिहारी के नीति-दोहों में कम शब्दों में व्यावहारिक जीवन के गहरे अनुभव और शिक्षाएँ दी गई हैं। इनमें विनम्रता, धन, मित्रता, स्वार्थ, शासन और मानवीय व्यवहार जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण संदेश मिलते हैं।

प्रश्न 17. बिहारीलाल किस काल के कवि थे?

उत्तर: बिहारीलाल हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख कवि थे।

प्रश्न 18. बिहारी के काव्य में कौन-कौन से प्रमुख भाव मिलते हैं?

उत्तर: बिहारी के काव्य में मुख्यतः श्रृंगार, भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन के भाव मिलते हैं।

⚡ एक पंक्ति में महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्न उत्तर
कवि बिहारीलाल
काल रीतिकाल
जन्म लगभग 1603 ई.
जन्म-स्थान बसुआ गोविंदपुर, ग्वालियर के निकट
पिता केशवराय
शिक्षा स्वामी नरहरिदास से संस्कृत, प्राकृत आदि
प्रमुख रचना बिहारी सतसई
भाषा ब्रजभाषा
शैली मुक्तक
मुख्य छंद दोहा
भक्ति का मुख्य संदेश निर्मल मन से ईश्वर-भक्ति
नीति का मुख्य संदेश विनम्रता, विवेक और व्यवहारिक ज्ञान

🎯 बोर्ड परीक्षा के लिए विशेष तैयारी

  • जीवन-परिचय: जन्म, जन्म-स्थान, पिता, शिक्षा-दीक्षा, प्रमुख रचना, साहित्यिक विशेषताएँ और मृत्यु अवश्य याद करें।
  • भक्ति भाग: राधा-वंदना, कृष्ण-सौंदर्य, कृष्ण-भक्ति, कपट-त्याग और सच्ची भक्ति मुख्य बिंदु हैं।
  • नीति भाग: दुहरा शासन, दुष्ट व्यक्ति, विनम्रता, धन और इच्छाएँ, मित्रता, सावधानी तथा स्वार्थ प्रमुख विषय हैं।
  • काव्य-सौंदर्य: भाषा, शैली, रस, छंद और अलंकार को अलग-अलग लिखना सीखें।
  • व्याख्या: उत्तर की शुरुआत संदर्भ से करें, फिर प्रसंग, शब्दार्थ और भावार्थ/ व्याख्या लिखें तथा अंत में काव्य-सौंदर्य दें।

🚀 2 मिनट में Chapter 4 की Revision

कवि
बिहारीलाल
काल
रीतिकाल
रचना
बिहारी सतसई
भाषा
ब्रजभाषा
शैली
मुक्तक
छंद
दोहा
भक्ति संदेश
निर्मल मन से ईश्वर-भक्ति
नीति संदेश
विनम्रता एवं विवेक

📚 UP Board Class 10 Hindi

अध्याय 4 — बिहारीलाल : भक्ति एवं नीति

जीवन-परिचय • सभी निर्धारित दोहे • शब्दार्थ • संदर्भ • प्रसंग • भावार्थ • काव्य-सौंदर्य • प्रश्न-उत्तर • परीक्षा तैयारी

Session 2026–27
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