1. ऊर्जा बैंड तथा पदार्थों का वर्गीकरण (Energy Bands & Classification)
ठोसों में परमाणुओं की अत्यधिक निकटता के कारण ऊर्जा स्तर पट्टियों (Bands) के रूप में विभाजित हो जाते हैं, जिन्हें ऊर्जा बैंड कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं: संयोजकता बैंड (Valence Band) और चालन बैंड (Conduction Band)। इनके बीच के रिक्त स्थान को वर्जित ऊर्जा अंतराल (Energy Gap - Eg) कहते हैं।
• चालक (Conductors): इनमें संयोजकता बैंड और चालन बैंड एक-दूसरे पर अतिव्यापित (Overlap) होते हैं, जिससे वर्जित अंतराल शून्य होता है और आसानी से धारा प्रवाहित होती है।
• कुचालक (Insulators): इनमें वर्जित ऊर्जा अंतराल बहुत अधिक (Eg > 3 eV) होता है, जिसके कारण इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में नहीं जा पाते।
• अर्धचालक (Semiconductors): इनका वर्जित अंतराल बहुत कम (~ 1 eV) होता है (जैसे सिलिकॉन और जर्मेनियम)। सामान्य ताप पर ये कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं लेकिन अशुद्धि मिलाने पर इनकी चालकता बढ़ जाती है।
2. आंतरिक एवं बाह्य अर्धचालक (P-type & N-type Semiconductors)
शुद्ध अर्धचालक को आंतरिक अर्धचालक (Intrinsic) कहते हैं। जब इसमें उपयुक्त अशुद्धि (Doping) मिलाई जाती है, तो ये बाह्य (Extrinsic) अर्धचालक बनते हैं:
• N-type अर्धचालक: जब शुद्ध अर्धचालक में पंचसंयोजकता (Pentavalent) वाली अशुद्धि (जैसे आर्सेनिक या एंटीमनी) मिलाई जाती है, तो मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है। इसमें बहुसंख्यक आवेश वाहक (Majority Charge Carriers) इलेक्ट्रॉन होते हैं।
• P-type अर्धचालक: जब शुद्ध अर्धचालक में त्रिसंयोजकता (Trivalent) वाली अशुद्धि (जैसे एल्युमिनियम या इंडियम) मिलाई जाती है, तो इलेक्ट्रॉनों की कमी से 'कोटर' या होल (Holes) बन जाते हैं। इसमें बहुसंख्यक आवेश वाहक होल होते हैं।
3. p-n संधि डायोड (p-n Junction Diode)
जब एक P-type अर्धचालक को विशेष विधि द्वारा N-type अर्धचालक के साथ जोड़ा जाता है, तो संपर्क तल पर बनी व्यवस्था को p-n संधि डायोड कहते हैं।
• अक्षय परत (Depletion Region): संधि के दोनों ओर इलेक्ट्रॉनों और होलों के विसरण (Diffusion) के कारण एक परत बनती है जिसमें स्वतंत्र आवेश वाहक नहीं होते हैं।
• अग्र अभिनति (Forward Bias): जब P-क्षेत्र को बैटरी के धन सिरे से और N-क्षेत्र को ऋण सिरे से जोड़ा जाता है, तो अक्षय परत पतली हो जाती है और धारा का प्रवाह आसानी से होता है।
• उत्क्रम अभिनति (Reverse Bias): जब P-क्षेत्र को ऋण सिरे से और N-क्षेत्र को धन सिरे से जोड़ा जाता है, तो अक्षय परत मोटी हो जाती है और धारा का प्रवाह लगभग शून्य होता है।
4. डायोड का दिष्टकारी के रूप में उपयोग (Diode as a Rectifier)
दिष्टकारी वह युक्ति है जो प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में परिवर्तित करती है। p-n संधि डायोड केवल अग्र अभिनति में धारा प्रवाहित होने देता है, इसलिए यह एक बेहतरीन दिष्टकारी है:
• अर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half-Wave Rectifier): इसमें AC चक्र के केवल आधे भाग (धनात्मक अर्ध-चक्र) के दौरान ही आउटपुट प्राप्त होता है।
• पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full-Wave Rectifier): इसमें दो p-n डायोडों का उपयोग करके AC के दोनों (धनात्मक और ऋणात्मक) चक्रों को दिष्ट धारा में बदला जाता है।
5. ज़ेनर डायोड (Zener Diode)
ज़ेनर डायोड एक विशेष रूप से निर्मित उच्च डोपिंग वाला p-n संधि डायोड है, जिसे विशेष रूप से उत्क्रम भंजन क्षेत्र (Reverse Breakdown Region) में काम करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।
• इसका मुख्य उपयोग **वोल्टेज नियंत्रक (Voltage Regulator)** के रूप में किया जाता है, जो निवेशी (Input) वोल्टेज में उतार-चढ़ाव होने के बावजूद लोड पर वोल्टता को स्थिर बनाए रखता है।
6. ट्रान्जिस्टर की कार्यप्रणाली (Transistor Action & Working)
ट्रान्जिस्टर एक तीन टर्मिनल वाली अर्धचालक युक्ति है, जिसमें एक पतला मध्य भाग (आधार - Base) दो बड़े भागों (उत्सर्जक - Emitter और संग्राहक - Collector) के बीच सिला होता है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं: n-p-n और p-n-p ट्रान्जिस्टर。
• मुख्य भाग:
- **उत्सर्जक (Emitter):** यह आवेश वाहकों को भेजता है (मध्यम आकार, उच्च डोपिंग)।
- **आधार (Base):** यह बहुत पतला और हल्का डोप्ड होता है।
- **संग्राहक (Collector):** यह सबसे बड़ा होता है और आवेश वाहकों को एकत्रित करता है।
• कार्यप्रणाली: सामान्यत: उत्सर्जक-आधार संधि को *अग्र अभिनति (Forward Bias)* और आधार-संग्राहक संधि को *उत्क्रम अभिनति (Reverse Bias)* में रखा जाता है। इसका उपयोग प्रवर्धक (Amplifier) और स्विच के रूप में किया जाता है।
7. बुनियादी लॉजिक गेट्स (Basic Logic Gates)
लॉजिक गेट ऐसे डिजिटल परिपथ हैं जो निवेशी (Inputs) और निर्गत (Output) वोल्टाओं के बीच तार्किक संबंध पर आधारित होते हैं। मुख्य डिजिटल गेट निम्नलिखित हैं:
• OR गेट: यदि कोई भी एक या दोनों इनपुट '1' (उच्च) हैं, तो आउटपुट '1' होगा (व्यंजक: Y = A + B)।
• AND गेट: जब सभी इनपुट '1' होंगे, तभी आउटपुट '1' प्राप्त होगा (व्यंजक: Y = A · B)।
• NOT गेट (इन्वर्टर): यह इनपुट को उल्टा कर देता है; '0' पर '1' और '1' पर '0' देता है (व्यंजक: Y = Ā)।
• NAND गेट: यह AND और NOT गेट का संयोजन है (व्यंजक: Y = A · B)।
• NOR गेट: यह OR और NOT गेट का संयोजन है (व्यंजक: Y = A + B)।
*(नोट: NAND और NOR गेट को **सार्वत्रिक गेट (Universal Gates)** कहा जाता है क्योंकि इनकी सहायता से किसी भी अन्य गेट या डिजिटल परिपथ को बनाया जा सकता है।)*

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