Home गीता सार गीता श्लोक अनुवाद Jakhai Baba UP Board Material GS Kitaab

Ads Area

कक्षा 12 भौतिक विज्ञान अध्याय 11: विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति (महत्वपूर्ण नोट्स)

1. प्रकाश विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect)

जब किसी उपयुक्त आवृत्ति का प्रकाश (या विद्युत चुंबकीय विकिरण) किसी धातु की सतह पर आपतित होता है, तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते हैं। इन उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को फोटो-इलेक्ट्रॉन तथा इस घटना को प्रकाश विद्युत प्रभाव कहते हैं।
कार्य फलन (Work Function - φ0): वह न्यूनतम ऊर्जा जो किसी धातु पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक होती है, उसका कार्य फलन कहलाती है।
देहली आवृत्ति (Threshold Frequency - ν0): आपतित प्रकाश की वह न्यूनतम आवृत्ति जिससे कम आवृत्ति पर प्रकाश विद्युत उत्सर्जन संभव नहीं होता।

2. हर्ट्ज तथा लेनार्ड के प्रयोग (Hertz and Lenard's Experiments)

(क) हर्ट्ज का प्रयोग (1887): हर्ट्ज ने अपने प्रयोग में विद्युत चुंबकीय तरंगों के उत्पादन के अध्ययन के दौरान देखा कि जब प्रेषित्र (Transmitter) के स्पार्क गैप पर पराबैंगनी प्रकाश डाला जाता है, तो स्पार्क अधिक आसानी से उत्पन्न होता है। यहीं से प्रकाश विद्युत प्रभाव की खोज की शुरुआत हुई।
(ख) लेनार्ड का प्रयोग: लेनार्ड ने यह प्रदर्शित किया कि जब धातु की प्लेट पर उपयुक्त आवृत्ति का प्रकाश डाला जाता है, तो परिपथ में धारा बहने लगती है। उन्होंने यह भी पाया कि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है।

3. आइंस्टीन का प्रकाश-विद्युत समीकरण (Einstein's Photoelectric Equation)

आइंस्टीन ने प्लांक के क्वांटम सिद्धांत के आधार पर प्रकाश विद्युत प्रभाव की व्याख्या की। उनके अनुसार, जब फोटोन की ऊर्जा धातु के कार्य फलन से अधिक होती है, तो उसका कुछ भाग इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने में तथा शेष भाग इलेक्ट्रॉन को अधिकतम गतिज ऊर्जा (Kmax) देने में खर्च होता है:

= φ0 + Kmax    (या   Kmax = h(ν - ν0))

4. द्रव्य तरंगें तथा डी-ब्रोग्ली तरंगदैर्ध्य (Matter Waves & De Broglie Wavelength)

डी-ब्रोग्ली के अनुसार, गतिमान कणों (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि) के साथ भी तरंगें जुड़ी होती हैं, जिन्हें द्रव्य तरंगें या डी-ब्रोग्ली तरंगें कहते हैं। द्रव्य कण की तरंगदैर्ध्य (λ) उसके संवेग (p) के व्युत्क्रमानुपाती होती है:

λ = hp = hmv    (जहाँ h प्लांक नियतांक है)
Sunil Learning Point • अध्याय 11 समाप्त अगला अध्याय (अध्याय 12) ➔
Tags

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Top Post Ad

Below Post Ad

Ads Area