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कक्षा-10 (हिन्दी) - गद्य खण्ड : Chapter-6 (ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से) : रामधारी सिंह ‘दिनकर’

📚 UP BOARD • कक्षा 10 • हिन्दी

ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से

✍️ रामधारी सिंह ‘दिनकर’

गद्य-खण्ड | सम्पूर्ण अध्याय समाधान

🎯 सत्र 2026–27 | बोर्ड परीक्षा 2027
📖 विषयहिन्दी
🎓 कक्षा10वीं
📕 अध्यायईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से
✍️ लेखकरामधारी सिंह ‘दिनकर’

📖 पाठ-परिचय

‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का विचारप्रधान निबन्ध है। इसमें लेखक ने मानव-मन में उत्पन्न होने वाली ईर्ष्या के स्वरूप, कारण, दुष्परिणाम और उससे बचने के उपायों पर विचार किया है।

लेखक बताते हैं कि ईर्ष्या मनुष्य को भीतर से अशांत करती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की उन्नति देखकर स्वयं दुखी होता है और अपने पास मौजूद सुखों का भी ठीक प्रकार से आनंद नहीं ले पाता।

लेखक ने ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता के संबंध को भी समझाया है। स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता मनुष्य को आगे बढ़ा सकती है, लेकिन जब प्रतिद्वंद्विता में दूसरे के सुख या सफलता को सहन न कर पाने की भावना आ जाती है, तब वह ईर्ष्या का रूप ले लेती है।

🎯 पाठ का केंद्रीय विचार:
ईर्ष्या मनुष्य को मानसिक रूप से दुखी करती है और उसके मौलिक गुणों का ह्रास करती है। इससे बचने के लिए मानसिक अनुशासन, आत्म-सुधार और सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है।

✍️ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ — पूर्ण जीवन-परिचय

🌟 जन्म एवं परिवार

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितंबर 1908 ई. को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता।

उनके पिता का नाम रवि सिंह तथा माता का नाम मनरूप देवी था। बचपन में ही पिता का निधन हो जाने के कारण परिवार की जिम्मेदारियों का प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा।

🎓 शिक्षा-दीक्षा

दिनकर जी ने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव और आसपास के विद्यालयों में प्राप्त की। आगे उन्होंने मोकामा घाट रेलवे हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान आदि विषयों का अध्ययन किया।

💼 कार्य-जीवन

शिक्षा पूर्ण करने के बाद दिनकर जी ने विभिन्न सरकारी और शैक्षिक पदों पर कार्य किया। उन्होंने अध्यापन, प्रशासन तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े विभिन्न दायित्वों का निर्वाह किया।

🏛️ सार्वजनिक एवं राजनीतिक जीवन

स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना का उनके साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। स्वतंत्रता के बाद वे सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय रहे और राज्यसभा के सदस्य रहे।

📚 साहित्यिक व्यक्तित्व

दिनकर जी हिन्दी के महान कवि, निबन्धकार और चिंतक थे। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता, वीरता, सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और जीवन-दर्शन की प्रभावशाली अभिव्यक्ति मिलती है।

उन्हें हिन्दी साहित्य में विशेष रूप से राष्ट्रकवि के रूप में प्रतिष्ठा मिली। उनकी भाषा ओजपूर्ण, प्रभावशाली और विचारप्रधान है।

📖 प्रमुख रचनाएँ

  • काव्य: रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, रेणुका, हुंकार, द्वंद्वगीत आदि।
  • गद्य: संस्कृति के चार अध्याय, अर्धनारीश्वर, मिट्टी की ओर आदि।
  • निबन्ध एवं चिंतन: सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विषयों पर अनेक रचनाएँ।

🏆 प्रमुख सम्मान

दिनकर जी को हिन्दी साहित्य में उनके महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।

🖋️ भाषा-शैली

दिनकर जी की भाषा मुख्यतः ओजपूर्ण, प्रभावशाली, प्रवाहपूर्ण और विचारप्रधान है। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दावली के साथ-साथ सहज हिन्दी का भी प्रयोग मिलता है।

गंभीर विचारों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने तर्क, उदाहरण, उपमा, रूपक, व्यंग्य और सूक्तियों का सुंदर प्रयोग किया है।

🕯️ निधन

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का निधन 24 अप्रैल 1974 को हुआ। हिन्दी साहित्य में उनका स्थान आज भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

🎯 बोर्ड परीक्षा के लिए जीवन-परिचय के मुख्य तथ्य:
  • जन्म — 23 सितंबर 1908
  • जन्मस्थान — सिमरिया, मुंगेर, बिहार
  • पिता — रवि सिंह
  • माता — मनरूप देवी
  • प्रमुख उपनाम — दिनकर
  • प्रमुख पहचान — राष्ट्रकवि
  • शिक्षा — पटना विश्वविद्यालय
  • प्रमुख क्षेत्र — कविता, निबन्ध, चिंतन
  • प्रमुख रचनाएँ — रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, संस्कृति के चार अध्याय
  • प्रमुख सम्मान — साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार
  • निधन — 24 अप्रैल 1974

📝 ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ — विस्तृत सारांश

इस निबन्ध में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ईर्ष्या जैसे मानवीय मनोभाव का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। लेखक स्वयं से प्रश्न करते हैं कि ज्ञान और अनुभव होने के बाद भी मनुष्य के मन से ईर्ष्या क्यों नहीं जाती।

ईर्ष्या का सबसे बड़ा दोष यह है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे के सुख को देखकर स्वयं दुखी होता है। उसके सामने सुख के अनेक साधन होते हुए भी दूसरे की उन्नति उसके अपने सुख को फीका कर देती है।

लेखक ने एक सम्पन्न वकील का उदाहरण देकर बताया है कि मनुष्य अपने पास उपलब्ध सुखों का आनंद लेने के बजाय दूसरे व्यक्ति के ऐश्वर्य से ईर्ष्या करके स्वयं को दुखी कर सकता है।

लेखक चिंता और ईर्ष्या में अंतर बताते हुए कहते हैं कि चिंता व्यक्ति के जीवन को खराब करती है, जबकि ईर्ष्या मनुष्य के मौलिक गुणों को भी नष्ट कर सकती है।

ईर्ष्या का संबंध प्रतिद्वंद्विता से भी है। मनुष्य अक्सर अपने समान या अपने आसपास के व्यक्ति से अधिक ईर्ष्या करता है, क्योंकि उसके साथ तुलना और प्रतिस्पर्धा की भावना रहती है।

लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि प्रतिद्वंद्विता अपने आप में बुरी नहीं है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को विकास की ओर ले जा सकती है, लेकिन दूसरे को गिराने की भावना ईर्ष्या को जन्म देती है।

लेखक के अनुसार ईर्ष्या से बचने के लिए व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए। उसे दूसरों की उपलब्धियों से जलने के बजाय अपने अभावों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

🌟 निष्कर्ष:
ईर्ष्या मनुष्य को भीतर से कमजोर और दुखी करती है। इसके स्थान पर आत्म-सुधार, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और सकारात्मक सोच को अपनाना चाहिए।

💡 पाठ के प्रमुख विचार

1️⃣ ईर्ष्या मनुष्य को दुखी करती है
ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे के सुख को देखकर स्वयं दुखी होता है। इस कारण वह अपने जीवन में उपलब्ध सुखों का भी आनंद नहीं ले पाता।
2️⃣ ईर्ष्या मौलिक गुणों का ह्रास करती है
ईर्ष्या केवल चिंता पैदा नहीं करती, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव, विवेक और सद्गुणों को भी कमजोर कर सकती है।
3️⃣ प्रतिद्वंद्विता और ईर्ष्या
स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता विकास में सहायक है, लेकिन जब व्यक्ति दूसरे की सफलता सहन नहीं कर पाता तो वही प्रतिद्वंद्विता ईर्ष्या में बदल जाती है।
4️⃣ आत्म-सुधार का मार्ग
दूसरों से जलने के बजाय व्यक्ति को अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
5️⃣ मानसिक अनुशासन
ईर्ष्या से बचने के लिए मन को अनुशासित करना आवश्यक है। व्यर्थ की बातों और अनावश्यक तुलना से बचना चाहिए।

📚 कठिन शब्द एवं शब्दार्थ

शब्द अर्थ
ईर्ष्यादूसरे की उन्नति या सुख से होने वाली जलन
दाहजलन
वेदनापीड़ा
दंशडंक या चोट
प्रतिद्वंद्विताआपस में आगे निकलने की प्रतियोगिता
स्पर्धाप्रतियोगिता
मौलिकमूल से संबंधित, मूलभूत
अनुशासननियमों का पालन और आत्म-नियंत्रण
दुर्गुणबुरा गुण
उन्नतऊँचा, श्रेष्ठ या विकसित
अभावकमी
प्रतिकूलविपरीत
विवेकसही-गलत का निर्णय करने की शक्ति
मानसिकमन से संबंधित

❓ महत्वपूर्ण लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ पाठ के लेखक कौन हैं?
उत्तर: इस पाठ के लेखक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।
प्रश्न 2. ईर्ष्या किसे कहते हैं?
उत्तर: दूसरे व्यक्ति के सुख, सफलता, संपत्ति या उन्नति को देखकर मन में उत्पन्न होने वाली जलन या असंतोष की भावना को ईर्ष्या कहते हैं।
प्रश्न 3. ईर्ष्यालु व्यक्ति को कौन-सी वेदना भोगनी पड़ती है?
उत्तर: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे के सुख और सफलता को देखकर स्वयं दुखी होता है। वह अपने सामने मौजूद सुखों का भी आनंद नहीं ले पाता और मानसिक पीड़ा भोगता है।
प्रश्न 4. ईर्ष्या का सबसे बड़ा दुष्परिणाम क्या है?
उत्तर: ईर्ष्या व्यक्ति को भीतर से अशांत करती है और उसके मौलिक गुणों का ह्रास करती है।
प्रश्न 5. चिंता और ईर्ष्या में क्या अंतर है?
उत्तर: चिंता व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करती है, जबकि ईर्ष्या व्यक्ति के मौलिक गुणों और चरित्र को भी कमजोर कर सकती है।
प्रश्न 6. ईर्ष्या का संबंध किससे होता है?
उत्तर: ईर्ष्या का संबंध प्रायः प्रतिद्वंद्विता और तुलना की भावना से होता है।
प्रश्न 7. मनुष्य का विकास किसके द्वारा होता है?
उत्तर: स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता और निरंतर प्रयास के द्वारा मनुष्य अपने विकास की ओर बढ़ता है।
प्रश्न 8. ईर्ष्या से बचने का उपाय क्या है?
उत्तर: ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। व्यक्ति को व्यर्थ की बातों और अनावश्यक तुलना से बचकर अपने अभावों को रचनात्मक ढंग से दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
प्रश्न 9. ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की सफलता से क्यों दुखी होता है?
उत्तर: क्योंकि वह दूसरों की उपलब्धियों की तुलना अपने जीवन से करता है और दूसरे की उन्नति को अपनी कमी के रूप में देखने लगता है।
प्रश्न 10. स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता क्या है?
उत्तर: ऐसी प्रतियोगिता जिसमें व्यक्ति दूसरे को गिराने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करता है, स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता कहलाती है।
प्रश्न 11. ईर्ष्यालु व्यक्ति का आनंद कैसा होता है?
उत्तर: ईर्ष्यालु व्यक्ति का आनंद वास्तविक और स्वस्थ नहीं होता। उसका सुख दूसरे के दुःख या असफलता से जुड़ जाता है।
प्रश्न 12. लेखक ईर्ष्या को किस प्रकार की मानसिक कमजोरी मानते हैं?
उत्तर: लेखक ईर्ष्या को ऐसी मानसिक कमजोरी मानते हैं जिसमें व्यक्ति अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट न रहकर दूसरों की उपलब्धियों से परेशान होता है।

✍️ महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ पाठ का सारांश लिखिए।

‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का विचारप्रधान निबन्ध है। इसमें लेखक ने ईर्ष्या के मनोवैज्ञानिक स्वरूप और उसके दुष्परिणामों का वर्णन किया है।

लेखक बताते हैं कि ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे के सुख और उन्नति को देखकर स्वयं दुखी होता है। उसके पास अपने सुखों के साधन होने पर भी दूसरे की संपन्नता उसकी खुशी को कम कर देती है।

लेखक चिंता और ईर्ष्या में अंतर बताते हैं तथा स्पष्ट करते हैं कि ईर्ष्या व्यक्ति के मौलिक गुणों का भी ह्रास कर सकती है। ईर्ष्या का संबंध प्रतिद्वंद्विता से है, लेकिन स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता विकास में सहायक होती है।

अंत में लेखक ईर्ष्या से बचने के लिए मानसिक अनुशासन, आत्म-सुधार और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 2. ईर्ष्या मनुष्य के लिए किस प्रकार हानिकारक है?

ईर्ष्या मनुष्य को मानसिक रूप से अशांत और दुखी बनाती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे की सफलता को देखकर स्वयं को असफल समझने लगता है।

इस कारण वह अपने पास उपलब्ध सुखों का आनंद नहीं ले पाता। उसके मन में असंतोष, जलन और दुर्भावना बढ़ती रहती है। इससे उसके चरित्र और मौलिक गुणों का भी ह्रास हो सकता है।

इस प्रकार ईर्ष्या व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संबंधों और व्यक्तित्व—तीनों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

प्रश्न 3. ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता में क्या संबंध है?

ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता का गहरा संबंध है। जब दो व्यक्तियों में आगे बढ़ने की प्रतियोगिता होती है तो प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न होती है।

यदि व्यक्ति इस प्रतिद्वंद्विता को स्वस्थ रूप में स्वीकार करता है तो वह स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करता है। लेकिन जब वह दूसरे की सफलता सहन नहीं कर पाता और दूसरे को गिराने की इच्छा करने लगता है, तब प्रतिद्वंद्विता ईर्ष्या का रूप ले लेती है।

अतः स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता विकास की प्रेरक है, जबकि ईर्ष्यापूर्ण प्रतिद्वंद्विता विनाशकारी है।

प्रश्न 4. ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

यह शीर्षक निबन्ध की मूल भावना को सीधे व्यक्त करता है। लेखक ईर्ष्या को मनुष्य के भीतर मौजूद ऐसी भावना के रूप में देखते हैं जिसे ज्ञान और अनुभव के बावजूद पूरी तरह दूर करना कठिन है।

पूरा निबन्ध ईर्ष्या के कारण, उसके प्रभाव और उससे बचने के उपायों पर केंद्रित है। इसलिए ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ शीर्षक अत्यंत सार्थक और विषयानुकूल है।

प्रश्न 5. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का साहित्यिक परिचय दीजिए।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि, निबन्धकार और चिंतक थे। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना, वीरता, सामाजिक सरोकार और मानवीय भावनाओं की प्रभावशाली अभिव्यक्ति मिलती है।

उनकी प्रमुख काव्य-कृतियों में ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘उर्वशी’, ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’ आदि उल्लेखनीय हैं। गद्य साहित्य में ‘संस्कृति के चार अध्याय’ विशेष महत्त्वपूर्ण है।

उनकी भाषा ओजपूर्ण, प्रभावशाली और विचारप्रधान है। हिन्दी साहित्य में उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त हुआ।

प्रश्न 6. ईर्ष्या से बचने के उपाय बताइए।

ईर्ष्या से बचने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए। दूसरों से अनावश्यक तुलना करने से बचना चाहिए।

दूसरों की सफलता से जलने के बजाय उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। अपने अभावों को पहचानकर उन्हें दूर करने के लिए रचनात्मक और सकारात्मक प्रयास करना चाहिए।

मानसिक अनुशासन, आत्मविश्वास, संतोष और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या से बचने में सहायक हैं।

📜 गद्यांश-आधारित प्रश्न एवं व्याख्या

📌 परीक्षा में लिखने का तरीका: गद्यांश आधारित प्रश्न में पहले सन्दर्भ, फिर प्रसंग, उसके बाद व्याख्या और अंत में संदेश/विशेष लिखें।
गद्यांश अभ्यास 1 — ईर्ष्या का दुष्परिणाम

सन्दर्भ: प्रस्तुत भाव हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ नामक निबन्ध से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।

प्रसंग: लेखक ने ईर्ष्यालु व्यक्ति की मानसिक स्थिति और उसके दुःख का वर्णन किया है।

व्याख्या: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरे के सुख को देखकर स्वयं दुखी होता है। वह दूसरे की सफलता को अपने लिए कष्ट का कारण मानता है और अपने पास उपलब्ध सुखों का भी आनंद नहीं ले पाता।

संदेश: हमें दूसरों की उन्नति से जलने के बजाय अपनी उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।

गद्यांश अभ्यास 2 — चिंता और ईर्ष्या

सन्दर्भ: प्रस्तुत भाव रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के निबन्ध ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ से संबंधित है।

प्रसंग: लेखक ने चिंता और ईर्ष्या के अंतर को स्पष्ट किया है।

व्याख्या: चिंता व्यक्ति के जीवन को परेशान कर सकती है, लेकिन ईर्ष्या उससे भी अधिक हानिकारक है, क्योंकि यह व्यक्ति के मौलिक गुणों को कमजोर कर सकती है।

निष्कर्ष: इसलिए ईर्ष्या को मन से दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

गद्यांश अभ्यास 3 — प्रतिद्वंद्विता

सन्दर्भ: यह भाव ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ निबन्ध से लिया गया है।

प्रसंग: लेखक ने ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता के संबंध को समझाया है।

व्याख्या: मनुष्य आगे बढ़ने के लिए दूसरे से प्रतिस्पर्धा करता है। यदि यह प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो तो व्यक्ति स्वयं को बेहतर बनाता है। परंतु दूसरे की सफलता से जलना ईर्ष्या है और यह व्यक्ति के विकास में बाधक बनती है।

गद्यांश अभ्यास 4 — ईर्ष्या से बचने का उपाय

सन्दर्भ: प्रस्तुत भाव ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ निबन्ध से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।

प्रसंग: लेखक ईर्ष्या से बचने के उपाय की चर्चा करते हैं।

व्याख्या: ईर्ष्या से बचने के लिए व्यक्ति को मानसिक अनुशासन अपनाना चाहिए। उसे व्यर्थ की बातों पर ध्यान देने के बजाय यह समझना चाहिए कि उसके जीवन में किस अभाव के कारण ईर्ष्या उत्पन्न हो रही है और उस अभाव को सकारात्मक ढंग से कैसे दूर किया जा सकता है।

संदेश: आत्म-सुधार ईर्ष्या से मुक्ति का बेहतर मार्ग है।

🎯 महत्वपूर्ण MCQ — Board Exam 2027

1. ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ के लेखक कौन हैं?

(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(ग) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(घ) महादेवी वर्मा
✅ सही उत्तर — (ख)
2. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म कब हुआ?

(क) 23 सितंबर 1908
(ख) 24 अप्रैल 1908
(ग) 15 अगस्त 1908
(घ) 27 मई 1908
✅ सही उत्तर — (क)
3. दिनकर जी का जन्मस्थान क्या है?

(क) पटना
(ख) सिमरिया
(ग) वाराणसी
(घ) मुंगेर शहर
✅ सही उत्तर — (ख)
4. दिनकर जी को किस नाम से विशेष रूप से जाना जाता है?

(क) राष्ट्रकवि
(ख) महाकवि
(ग) जनकवि
(घ) लोककवि
✅ सही उत्तर — (क)
5. ‘रश्मिरथी’ किसकी रचना है?

(क) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) निराला
(घ) प्रसाद
✅ सही उत्तर — (क)
6. ईर्ष्या का संबंध किससे होता है?

(क) प्रतिद्वंद्विता से
(ख) मित्रता से
(ग) सहयोग से
(घ) त्याग से
✅ सही उत्तर — (क)
7. ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों के सुख को देखकर क्या अनुभव करता है?

(क) प्रसन्नता
(ख) संतोष
(ग) मानसिक पीड़ा
(घ) उत्साह
✅ सही उत्तर — (ग)
8. ईर्ष्या से बचने का प्रमुख उपाय क्या है?

(क) दूसरों की निंदा
(ख) मानसिक अनुशासन
(ग) अधिक तुलना
(घ) क्रोध
✅ सही उत्तर — (ख)
9. स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता का परिणाम क्या हो सकता है?

(क) विकास
(ख) पतन
(ग) आलस्य
(घ) निराशा
✅ सही उत्तर — (क)
10. ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ किस विधा की रचना है?

(क) कहानी
(ख) नाटक
(ग) निबन्ध
(घ) उपन्यास
✅ सही उत्तर — (ग)
11. दिनकर जी की भाषा की प्रमुख विशेषता क्या है?

(क) ओजपूर्ण एवं प्रभावशाली
(ख) अत्यंत कठिन एवं अस्पष्ट
(ग) केवल बोलचाल की
(घ) केवल उर्दू प्रधान
✅ सही उत्तर — (क)
12. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ किसकी रचना है?

(क) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(ख) प्रेमचंद
(ग) निराला
(घ) भारतेंदु हरिश्चंद्र
✅ सही उत्तर — (क)

⚡ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

1. दिनकर जी का पूरा नाम क्या था?
उत्तर: रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
2. दिनकर जी का जन्म कब हुआ?
उत्तर: 23 सितंबर 1908 को।
3. दिनकर जी का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर: सिमरिया गाँव, मुंगेर, बिहार में।
4. दिनकर जी का उपनाम क्या था?
उत्तर: ‘दिनकर’।
5. दिनकर जी को किस उपाधि से जाना जाता है?
उत्तर: राष्ट्रकवि।
6. ईर्ष्या क्या है?
उत्तर: दूसरों के सुख या सफलता से उत्पन्न जलन की भावना।
7. ईर्ष्या से व्यक्ति क्या खो देता है?
उत्तर: मानसिक शांति और अपने मौलिक गुणों को।
8. ईर्ष्या से बचने का उपाय क्या है?
उत्तर: मानसिक अनुशासन।
9. दिनकर जी की एक प्रमुख काव्य-कृति बताइए।
उत्तर: रश्मिरथी।
10. दिनकर जी का निधन कब हुआ?
उत्तर: 24 अप्रैल 1974 को।

🔥 Board Exam 2027 — Most Important Questions

⭐ परीक्षा के लिए विशेष रूप से तैयार करें

  1. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन-परिचय एवं साहित्यिक परिचय लिखिए।
  2. ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ पाठ का सारांश लिखिए।
  3. ईर्ष्या मनुष्य के लिए किस प्रकार हानिकारक है?
  4. ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता में क्या संबंध है?
  5. ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
  6. चिंता और ईर्ष्या में क्या अंतर है?
  7. ईर्ष्या से बचने के उपाय बताइए।
  8. ईर्ष्यालु व्यक्ति की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
  9. स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता मनुष्य के विकास में किस प्रकार सहायक है?
  10. दिनकर जी की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।
  11. दिनकर जी की प्रमुख रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
  12. ईर्ष्या व्यक्ति के मौलिक गुणों को किस प्रकार प्रभावित करती है?

📌 Quick Revision — एक नजर में

ईर्ष्या रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राष्ट्रकवि प्रतिद्वंद्विता मानसिक अनुशासन आत्म-सुधार सकारात्मक सोच रश्मिरथी कुरुक्षेत्र उर्वशी

🎯 30 सेकंड Revision:
  • पाठ — ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’
  • लेखक — रामधारी सिंह ‘दिनकर’
  • जन्म — 23 सितंबर 1908
  • जन्मस्थान — सिमरिया, मुंगेर, बिहार
  • उपनाम — दिनकर
  • प्रसिद्ध उपाधि — राष्ट्रकवि
  • प्रमुख रचनाएँ — रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, उर्वशी
  • प्रमुख गद्य-कृति — संस्कृति के चार अध्याय
  • मुख्य विषय — ईर्ष्या का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
  • ईर्ष्या का दुष्परिणाम — मानसिक अशांति एवं गुणों का ह्रास
  • ईर्ष्या से बचने का उपाय — मानसिक अनुशासन
  • निधन — 24 अप्रैल 1974

✅ अध्याय का निष्कर्ष

‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ मनुष्य के भीतर छिपी ईर्ष्या की भावना का गहन विश्लेषण करने वाला निबन्ध है। दिनकर जी ने बताया है कि ईर्ष्या व्यक्ति को स्वयं ही दुःख देती है।

दूसरों की सफलता से जलने के बजाय हमें उससे प्रेरणा लेकर अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, आत्म-सुधार और मानसिक अनुशासन ईर्ष्या से बचने के प्रभावी मार्ग हैं।

अतः मनुष्य को दूसरों से तुलना करके दुखी होने के बजाय अपनी क्षमता और गुणों के विकास पर ध्यान देना चाहिए।

📚 UP Board Class 10 Hindi | Session 2026–27
“ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से” — रामधारी सिंह ‘दिनकर’
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