अध्याय 4 — “अजन्ता”
✍️ भगवतशरण उपाध्याय
गद्य-खण्ड | सम्पूर्ण पाठ समाधान
📖 अध्याय परिचय
‘अजन्ता’ भगवतशरण उपाध्याय का प्रसिद्ध वर्णनात्मक एवं कला-सांस्कृतिक निबंध है। इसमें लेखक ने अजन्ता की गुफाओं, उनमें बने भित्तिचित्रों, मूर्तिकला तथा भारतीय कला की अद्भुत प्रतिभा का प्रभावपूर्ण वर्णन किया है।
लेखक अजन्ता को केवल पुरानी गुफाओं का समूह नहीं मानते, बल्कि उसे भारतीय कला, संस्कृति, धर्म, सौन्दर्य-बोध और कलात्मक प्रतिभा की अमूल्य धरोहर के रूप में देखते हैं।
पाठ में अजन्ता के चित्रों की जीवंतता, रंग-संयोजन, भाव-प्रकाशन और कलात्मक कौशल का वर्णन करते हुए लेखक प्राचीन भारतीय कलाकारों की अद्भुत कल्पनाशक्ति से पाठक का परिचय कराते हैं।
✍️ भगवतशरण उपाध्याय — पूर्ण जीवन-परिचय
🌟 जन्म एवं परिवार
डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 ई. में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के उजियारीपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित रघुनन्दन उपाध्याय था, जो बलिया के प्रतिष्ठित वकील थे। उनकी माता का नाम महादेवी था।
🎓 शिक्षा-दीक्षा
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बलिया क्षेत्र में हुई। बचपन से ही उन्हें भारतीय इतिहास, संस्कृति और संस्कृत साहित्य में विशेष रुचि थी।
उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और बाद में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) से प्राचीन इतिहास में एम.ए. किया। इतिहास, पुरातत्त्व, संस्कृति और प्राचीन भारतीय सभ्यता के गहन अध्ययन ने उनके व्यक्तित्व को विशेष विद्वत्ता प्रदान की।
📚 साहित्यिक एवं विद्वत् जीवन
भगवतशरण उपाध्याय इतिहास, पुरातत्त्व, भारतीय संस्कृति और कला के गंभीर अध्येता थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन किया। वे निबंधकार, इतिहासकार, पुरातत्त्वविद्, संस्कृति-मर्मज्ञ, आलोचक और कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हुए।
उन्होंने भारतीय कला एवं संस्कृति को देश-विदेश में समझाने और प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे अनेक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े रहे।
🏛️ कार्यक्षेत्र
उन्होंने संग्रहालयों, विश्वविद्यालयों और शोध-संस्थानों में महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। वे प्रयाग और लखनऊ के पुरातत्त्व/ संग्रहालय संबंधी कार्यों से जुड़े रहे तथा बिड़ला कॉलेज, पिलानी में अध्यापन भी किया।
बाद में वे हैदराबाद के Institute of Asian Studies से भी जुड़े और विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष रहे।
📖 प्रमुख रचनाएँ
- कालिदास का भारत
- गुप्तकालीन संस्कृति
- भारतीय इतिहास के आलोक स्तंभ
- भारतीय कला और संस्कृति की भूमिका
- भारतीय संस्कृति के स्रोत
- प्राचीन यात्री
- सांस्कृतिक चिंतन
- इतिहास साक्षी है
- साहित्य और परम्परा
- खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर
🖋️ भाषा-शैली
इनकी भाषा मुख्यतः परिष्कृत, साहित्यिक एवं प्रभावपूर्ण खड़ीबोली हिन्दी है। इनकी शैली में वर्णनात्मक, विवेचनात्मक तथा भावात्मक तीनों रूप दिखाई देते हैं। इतिहास, कला और संस्कृति का ज्ञान होने के कारण उनके वर्णन में तथ्य और संवेदना का सुंदर समन्वय मिलता है।
🕯️ निधन
डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का निधन 12 अगस्त 1982 को हुआ। वे अपने पीछे भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व, कला और संस्कृति पर आधारित समृद्ध साहित्य छोड़ गए।
- जन्म — सन् 1910 ई.
- जन्म-स्थान — उजियारीपुर, बलिया, उत्तर प्रदेश
- पिता — पंडित रघुनन्दन उपाध्याय
- माता — महादेवी
- शिक्षा — इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
- विशेष अध्ययन — प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति
- प्रमुख क्षेत्र — इतिहास, पुरातत्त्व, कला, संस्कृति एवं साहित्य
- प्रमुख रचना — ‘अजन्ता’
- निधन — 12 अगस्त 1982
📝 ‘अजन्ता’ का विस्तृत सारांश
अजन्ता महाराष्ट्र में स्थित प्राचीन बौद्ध गुफाओं और भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। यह भारतीय कला और संस्कृति की महान धरोहर है। लेखक जब अजन्ता की कला का वर्णन करते हैं तो उनके सामने केवल पत्थर की गुफाएँ नहीं, बल्कि प्राचीन भारत का एक जीवंत कलाजगत उपस्थित हो जाता है।
अजन्ता की गुफाओं में अनेक प्रकार के चित्र और मूर्तियाँ मिलती हैं। इन चित्रों में मनुष्य के जीवन, भावनाओं, धार्मिक प्रसंगों, राजकीय जीवन, प्रकृति तथा सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है।
लेखक विशेष रूप से इन चित्रों की जीवंतता से प्रभावित हैं। चित्रों में बने चेहरे, आँखें, हाथों की मुद्राएँ और शरीर की गतियाँ इतनी स्वाभाविक हैं कि वे जीवित प्रतीत होते हैं।
अजन्ता के कलाकारों ने रंगों और रेखाओं का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया है। उन्होंने थोड़े साधनों में भी भावों की गहरी अभिव्यक्ति की है। चित्रों में करुणा, प्रेम, वात्सल्य, आश्चर्य, शान्ति और अनेक मानवीय भाव सहज रूप से दिखाई देते हैं।
लेखक के अनुसार अजन्ता के कलाकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल बाहरी रूप नहीं बनाते, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक भावों को भी चित्र में उतार देते हैं। यही कारण है कि अजन्ता के चित्र आज भी दर्शक के मन को प्रभावित करते हैं।
अजन्ता की कला से प्राचीन भारतीय समाज और संस्कृति की भी जानकारी प्राप्त होती है। चित्रों में तत्कालीन वेशभूषा, आभूषण, भवन, संगीत, नृत्य, पशु-पक्षी और सामाजिक जीवन के अनेक दृश्य दिखाई देते हैं।
इस प्रकार अजन्ता केवल कला का संग्रह नहीं है। वह भारतीय सभ्यता, धर्म, इतिहास, सौन्दर्य-बोध और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज है।
🎨 अजन्ता की कला की प्रमुख विशेषताएँ
📚 कठिन शब्द एवं शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भित्तिचित्र | दीवार पर बनाया गया चित्र |
| पुरातत्त्व | प्राचीन वस्तुओं एवं अवशेषों का अध्ययन |
| कलाकृति | कला की रचना |
| जीवंतता | जीवन से युक्त होने का भाव |
| भावाभिव्यक्ति | भावों को व्यक्त करना |
| सौन्दर्य-बोध | सुंदरता को पहचानने और अनुभव करने की क्षमता |
| मुद्रा | शरीर की विशेष स्थिति या भाव-भंगिमा |
| मर्म | गहरी बात या रहस्य |
| विरासत | पूर्वजों से प्राप्त धरोहर |
| अवशेष | बची हुई प्राचीन वस्तु |
| भव्य | बहुत सुंदर और प्रभावशाली |
| अनुपम | जिसकी कोई तुलना न हो |
| प्राचीन | बहुत पुराना |
| संवेदना | भावनात्मक अनुभूति |
| सूक्ष्म | बहुत बारीक |
❓ महत्वपूर्ण लघु उत्तरीय प्रश्न
✍️ महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
‘अजन्ता’ पाठ में भगवतशरण उपाध्याय ने अजन्ता की प्राचीन गुफाओं और उनमें निर्मित भित्तिचित्रों तथा मूर्तियों का प्रभावपूर्ण वर्णन किया है।
लेखक अजन्ता की कला में दिखाई देने वाली जीवंतता, सौन्दर्य और भाव-अभिव्यक्ति से अत्यंत प्रभावित हैं। प्राचीन कलाकारों ने मनुष्य के बाहरी रूप के साथ-साथ उसके आंतरिक भावों को भी चित्रित किया है।
इन चित्रों से प्राचीन भारत के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की अनेक झलकियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए अजन्ता केवल कला की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अजन्ता के चित्रों में रेखाओं, रंगों और भावों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी जीवंतता है।
कलाकारों ने चेहरे और आँखों के भावों तथा शरीर की मुद्राओं द्वारा मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।
चित्रों में प्रकृति, पशु-पक्षी, वेशभूषा, आभूषण और सामाजिक जीवन का भी सुंदर चित्रण हुआ है। इससे अजन्ता की कला अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती है।
अजन्ता में प्राचीन भारतीय कला, धर्म, संस्कृति और सामाजिक जीवन के अनेक प्रमाण सुरक्षित हैं। इसके चित्र और मूर्तियाँ प्राचीन कलाकारों की उच्च कलात्मक प्रतिभा का परिचय देती हैं।
इनमें तत्कालीन जीवन, वेशभूषा, आभूषण, प्रकृति, धार्मिक प्रसंग तथा मानवीय भावों का चित्रण मिलता है। इसलिए अजन्ता भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।
डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 ई. में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के उजियारीपुर गाँव में हुआ। उनके पिता पंडित रघुनन्दन उपाध्याय तथा माता महादेवी थीं। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में एम.ए. किया।
वे इतिहास, पुरातत्त्व, कला और भारतीय संस्कृति के प्रसिद्ध विद्वान थे। उन्होंने अनेक विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं में अध्यापन और शोध संबंधी कार्य किए।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘कालिदास का भारत’, ‘गुप्तकालीन संस्कृति’, ‘भारतीय इतिहास के आलोक स्तंभ’, ‘भारतीय कला और संस्कृति की भूमिका’ तथा ‘इतिहास साक्षी है’ आदि उल्लेखनीय हैं।
उनकी भाषा परिष्कृत साहित्यिक खड़ीबोली तथा शैली वर्णनात्मक, विवेचनात्मक और भावात्मक है। उनका निधन 12 अगस्त 1982 को हुआ।
पूरे पाठ का केंद्र अजन्ता की गुफाएँ, उनकी कला, भित्तिचित्र, मूर्तियाँ तथा उनसे जुड़ी भारतीय सांस्कृतिक विरासत है।
लेखक ने अजन्ता की कला के माध्यम से प्राचीन भारतीय कलाकारों की प्रतिभा और भारतीय संस्कृति की समृद्धि को स्पष्ट किया है। इसलिए ‘अजन्ता’ शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
📜 गद्यांश-आधारित प्रश्नोत्तर
“प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के गद्य-खण्ड में संकलित भगवतशरण उपाध्याय द्वारा लिखित ‘अजन्ता’ नामक पाठ से लिया गया है। इसमें लेखक ने अजन्ता की कला, भित्तिचित्रों और प्राचीन भारतीय कलाकारों की प्रतिभा का प्रभावपूर्ण वर्णन किया है।”
भावार्थ: अजन्ता की कला प्राचीन भारतीय कलाकारों की अद्भुत प्रतिभा और सौन्दर्य-बोध का परिचय देती है।
भावार्थ: अजन्ता के चित्र इतने स्वाभाविक और भावपूर्ण हैं कि वे जीवित प्रतीत होते हैं।
भावार्थ: अजन्ता के चित्रों में प्राचीन भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती है।
भावार्थ: अजन्ता भारतीय कला की उच्च परम्परा और कलाकारों की अद्भुत प्रतिभा का प्रमाण है।
🎯 महत्वपूर्ण MCQ — Board Exam 2027
(क) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(ख) भगवतशरण उपाध्याय
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) जयशंकर प्रसाद
(क) 1905
(ख) 1910
(ग) 1915
(घ) 1920
(क) वाराणसी
(ख) प्रयागराज
(ग) उजियारीपुर, बलिया
(घ) लखनऊ
(क) महादेव सहाय
(ख) रघुनन्दन उपाध्याय
(ग) रामचन्द्र उपाध्याय
(घ) शिवप्रसाद
(क) महादेवी
(ख) कमलेश्वरी देवी
(ग) श्यामा देवी
(घ) सरस्वती देवी
(क) हिन्दी
(ख) अंग्रेजी
(ग) प्राचीन इतिहास
(घ) अर्थशास्त्र
(क) समुद्र तट
(ख) भित्तिचित्र एवं गुफाएँ
(ग) आधुनिक भवन
(घ) कृषि
(क) कृत्रिमता
(ख) जीवंतता एवं भाव-अभिव्यक्ति
(ग) केवल आकार
(घ) केवल रंग
(क) प्राचीन भारतीय जीवन
(ख) केवल आधुनिक जीवन
(ग) केवल विदेशी जीवन
(घ) केवल कृषि
(क) भारतीय संस्कृति की
(ख) केवल आधुनिक संस्कृति की
(ग) केवल विदेशी संस्कृति की
(घ) इनमें से कोई नहीं
(क) इतिहास एवं पुरातत्त्व
(ख) गणित
(ग) भौतिक विज्ञान
(घ) चिकित्सा
(क) मानवीय भाव
(ख) सामाजिक जीवन
(ग) प्रकृति
(घ) उपर्युक्त सभी
(क) साहित्यिक एवं परिष्कृत खड़ीबोली
(ख) केवल बोलचाल की
(ग) केवल उर्दू
(घ) केवल अंग्रेजी
(क) 12 अगस्त 1982
(ख) 28 फरवरी 1963
(ग) 15 अगस्त 1980
(घ) 3 दिसम्बर 1982
⚡ अति लघु उत्तरीय प्रश्न
🔥 Board Exam 2027 — Most Important Questions
⭐ इन प्रश्नों को विशेष रूप से तैयार करें
- भगवतशरण उपाध्याय का जीवन-परिचय एवं साहित्यिक परिचय लिखिए।
- भगवतशरण उपाध्याय की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।
- ‘अजन्ता’ पाठ का सारांश लिखिए।
- अजन्ता की कला की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
- अजन्ता के चित्रों की जीवंतता स्पष्ट कीजिए।
- अजन्ता के चित्रों में भाव-अभिव्यक्ति किस प्रकार हुई है?
- अजन्ता भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर क्यों है?
- अजन्ता के चित्रों से प्राचीन भारतीय जीवन की क्या जानकारी मिलती है?
- ‘अजन्ता’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
- अजन्ता के कलाकारों की कलात्मक प्रतिभा पर प्रकाश डालिए।
- पाठ में वर्णित भारतीय कला की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
- ‘अजन्ता’ पाठ के आधार पर भारतीय कला की महानता स्पष्ट कीजिए।
📌 Quick Revision — एक नजर में
- पाठ — अजन्ता
- लेखक — भगवतशरण उपाध्याय
- जन्म — सन् 1910 ई.
- जन्म-स्थान — उजियारीपुर, बलिया
- पिता — पंडित रघुनन्दन उपाध्याय
- माता — महादेवी
- उच्च शिक्षा — काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
- विशेष अध्ययन — प्राचीन इतिहास
- मुख्य विषय — अजन्ता की कला एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत
- निधन — 12 अगस्त 1982
✅ अध्याय का निष्कर्ष
अध्याय 4 — अजन्ता
✍️ भगवतशरण उपाध्याय

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