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Class 12th Chemistry Chapter-6 : हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन (Haloalkanes and Haloarenes)

🧪 NCERT कक्षा 12 रसायन विज्ञान • सत्र 2026-27 (हिंदी माध्यम)
⚗️ अध्याय - 6 (CHAPTER 6) 🧪

हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन्स
(Haloalkanes and Haloarenes)

🔬 मुख्य बोर्ड अभिक्रियाएँ व क्रियाविधि (Key Topics)
⚛️ RX एवं ArX वर्गीकरण SN1 एवं SN2 क्रियाविधि 🔥 वुर्ट्ज़, फिटिग व डार्ज़न अभिक्रिया 🧪 फिनकेल्स्टाइन व स्वार्ट्स अभिक्रिया
⚗️ R-X & C₆H₅-X  |  🟣 C-X आबंध ध्रुवीयता  |  🔬 CHCl₃ (क्लोरोफॉर्म) & DDT  |  🧲 रेसमिक मिश्रण
📝 100% बोर्ड स्पेशल हिंदी हस्तलिखित नोट्स 🌐 Sunil Learning Point

🧪 टॉपिक 1: हैलोऐल्केन एवं हैलोऐरीन्स - परिचय, वर्गीकरण व विरचन की विधियाँ

📌 1. परिचय एवं वर्गीकरण (Classification)

ऐलिफैटिक या एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन से हाइड्रोजन परमाणु को हैलोजन परमाणु (F, Cl, Br, I) द्वारा प्रतिस्थापित करने पर क्रमशः हैलोऐल्केन (R-X) तथा हैलोऐरीन (Ar-X) प्राप्त होते हैं।

मुख्य वर्गीकरण प्रकार:
हैलोजन संख्या के आधार पर: मोनोहैलो (CH₃Cl), डाइहैलो (CH₂Cl₂), ट्राईहैलो (CHCl₃)।
sp³ C-X आबंध युक्त यौगिक:
  1. ऐल्किल हैलाइड: प्राथमिक (1° - RCH₂X), द्वितीयक (2° - R₂CHX), तृतीयक (3° - R₃CX)।
  2. ऐलिलिक हैलाइड (Allylic): हैलोजन sp³ कार्बन से जुड़ा हो, जो C=C द्विआबंध के ठीक बगल में हो (CH₂=CH-CH₂X)।
  3. बेंजिलिक हैलाइड (Benzylic): हैलोजन एरोमैटिक वलय के बगल वाले sp³ कार्बन से जुड़ा हो (C₆H₅-CH₂X)।
sp² C-X आबंध युक्त यौगिक: वाइनिलिक हैलाइड (CH₂=CH-X) एवं एराइल हैलाइड (C₆H₅-X)।
⚡ C-X आबंध की प्रकृति (Nature of C-X Bond):
हैलोजन परमाणु की विद्युत-ऋणात्मकता (Electronegativity) कार्बन से अधिक होने के कारण C-X आबंध ध्रुवीय (Polar) होता है। कार्बन पर आंशिक धनावेश (Cδ+) तथा हैलोजन पर आंशिक ऋणावेश (Xδ-) आ जाता है।

⚙️ 2. हैलोऐल्केन के विरचन (निर्माण) की प्रमुख विधियाँ

1. ऐल्कोहॉल से (उत्कृष्ट विधि - डार्ज़न प्रक्रम):
R-OH + SOCl₂ (थायोनिल क्लोराइड) → R-Cl + SO₂↑ + HCl↑
(नोट: SO₂ व HCl गैस रूप में बाहर निकल जाते हैं, अतः शुद्ध ऐल्किल क्लोराइड प्राप्त होता है।)
2. ऐल्कीन से (मार्कोनीकॉफ का नियम):
CH₃-CH=CH₂ + H-Br → CH₃-CH(Br)-CH₃ (2-ब्रोमोप्रोपेन)
(ऋणात्मक भाग उस असंतृप्त कार्बन से जुड़ता है जिस पर H की संख्या कम होती है।)
3. हैलोजन विनिमय - फिनकेल्स्टाइन अभिक्रिया:
R-Cl + NaI (शुष्क ऐसीटोन)R-I + NaCl↓
(ऐल्किल आयोडाइड बनाने की सर्वोत्तम विधि)
4. हैलोजन विनिमय - स्वार्ट्स अभिक्रिया:
R-Br + AgF → R-F + AgBr↓
(ऐल्किल फ्लोराइड बनाने हेतु AgF, Hg₂F₂, CoF₂ आदि का प्रयोग करते हैं।)

🔥 बोर्ड परीक्षा विशेष: नाम वाली अभिक्रियाएँ (Name Reactions)

प्रश्न 1: डार्ज़न प्रक्रम (Darzen's Process) द्वारा ऐल्किल क्लोराइड बनाना क्यों सबसे उपयुक्त माना जाता है?
उत्तर: क्योंकि इस अभिक्रिया में उप-उत्पाद SO₂ तथा HCl दोनों गैसीय अवस्था में प्राप्त होते हैं जो अभिक्रिया मिश्रण से आसानी से बाहर निकल जाते हैं, जिससे शुद्ध R-Cl प्राप्त होता है।
प्रश्न 2: फिनकेल्स्टाइन (Finkelstein) एवं स्वार्ट्स (Swarts) अभिक्रिया का मुख्य उपयोग क्या है?
उत्तर: फिनकेल्स्टाइन अभिक्रिया का उपयोग ऐल्किल आयोडाइड (R-I) तथा स्वार्ट्स अभिक्रिया का उपयोग ऐल्किल फ्लोराइड (R-F) के निर्माण हेतु हैलोजन विनिमय (Halogen Exchange) विधि के रूप में किया जाता है।
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टॉपिक 2: हैलोऐल्केन के रासायनिक गुणधर्म (SN1, SN2 एवं विलोपन)

📌 1. नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (SN1 एवं SN2)

जब इलेक्ट्रॉन धनी नाभिकरागी (Nucleophile - Nu⁻) ध्रुवीय C-X आबंध के आंशिक धनावेशित कार्बन पर आक्रमण करके हैलोजन (X⁻) को प्रतिस्थापित कर देता है, तो इसे नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। यह दो क्रियाविधियों से होती है:

लक्षण (Feature) SN1 (एकअणुक नाभिकरागी प्रतिस्थापन) SN2 (द्विअणुक नाभिकरागी प्रतिस्थापन)
पदों की संख्या दो पदों (Two Steps) में पूर्ण होती है। एक पद (Single Step) में पूर्ण होती है।
मध्यवर्ती (Intermediate) कार्बोधनायन (Carbocation) बनता है। संक्रमण अवस्था (Transition State) बनती है।
क्रियाशीलता का क्रम 3° > 2° > 1° > CH₃X CH₃X > 1° > 2° > 3°
त्रिद्विम रसायन (Stereochemistry) रेसमीकरण (Racemisation) होता है। वालडन प्रतिलोमन (Walden Inversion) होता है।
विलायक की प्रकृति ध्रुवीय प्रोटीक विलायक (जल, ऐल्कोहॉल)। ध्रुवीय अप्रोटिक विलायक (ऐसीटोन, DMSO)।

🔥 2. विलोपन अभिक्रिया (β-Elimination) एवं सैत्ज़ेफ का नियम

जब β-हाइड्रोजन युक्त ऐल्किल हैलाइड को ऐल्कोहॉलीय KOH (Alc. KOH) के साथ गर्म किया जाता है, तो α-कार्बन से हैलोजन परमाणु तथा β-कार्बन से हाइड्रोजन परमाणु का विलोपन होकर ऐल्कीन (Alkene) बनती है। इसे डीहाइड्रोहैलोजनीकरण कहते हैं।

सैत्ज़ेफ का नियम (Saytzeff's Rule):
यदि डीहाइड्रोहैलोजनीकरण से एक से अधिक ऐल्कीन बनने की सम्भावना हो, तो **वह ऐल्कीन मुख्य उत्पाद (Major Product)** के रूप में प्राप्त होती है जिसमें द्विआबंध (C=C) से जुड़े ऐल्किल समूहों की संख्या अधिक होती है (अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन)।
उदाहरण: 2-ब्रोमोब्यूटेन का विलोपन:
  • ब्यूट-2-ईन (81% - मुख्य उत्पाद) [अधिक प्रतिस्थापित]
  • ब्यूट-1-ईन (19% - अल्प उत्पाद)

🧪 3. धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ (Reactions with Metals)

1. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक का निर्माण (Mg से अभिक्रिया):
R-X + Mg (शुष्क ईथर)R-Mg-X (ऐल्किल मैग्नीशियम हैलाइड)
(अत्यंत क्रियाशील; जल की उपस्थिति में तुरंत ऐल्केन में अपचयित हो जाता है: R-MgX + H₂O → R-H + Mg(OH)X)
2. वुर्ट्ज़ अभिक्रिया (Wurtz Reaction):
2R-X + 2Na (शुष्क ईथर)R-R + 2NaX
(इस अभिक्रिया द्वारा सम कार्बन संख्या वाले उच्च ऐल्केन प्राप्त किए जाते हैं।)

🔥 बोर्ड परीक्षा विशेष प्रश्न (Board Important Conceptual Questions)

प्रश्न 1: तृतीयक ऐल्किल हैलाइड (3°) SN1 अभिक्रिया के प्रति सर्वाधिक क्रियाशील क्यों होते हैं?
उत्तर: क्योंकि SN1 अभिक्रिया में प्रथम पद में कार्बोधनायन (Carbocation) बनता है। +I प्रभाव एवं अतिसमयुग्मन (Hyperconjugation) के कारण 3° कार्बोधनायन (3° Carbocation) 1° तथा 2° से अत्यधिक स्थाई होता है।
प्रश्न 2: ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक का विरचन अनार्द्र (शुष्क ईथर) परिस्थितियों में ही क्यों किया जाता है?
उत्तर: ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक (R-Mg-X) अत्यंत क्रियाशील होता है। यदि नमी (जल H₂O) या प्रोटॉन दाता उपस्थित हो तो यह तुरंत क्रिया करके ऐल्केन (R-H) बना लेता है, इसलिए इसे केवल निर्जलीय व शुष्क वातावरण में ही बनाया जाता है।
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🧪 टॉपिक 3: हैलोऐरीन्स (Haloarenes) एवं पॉलीहैलोजन यौगिक

📌 1. हैलोऐरीन्स का विरचन एवं कम क्रियाशीलता का कारण

सैंडमायर अभिक्रिया (Sandmeyer's Reaction): एनिलीन की प्राथमिक ऐमीन क्रिया 273-278 K पर NaNO₂ + HCl से कराने पर बेंजीन डाइऐजोनियम क्लोराइड बनता है, जो Cu₂Cl₂/HCl या Cu₂Br₂/HBr के साथ गर्म करने पर क्लोरोबेंजीन या ब्रोमोबेंजीन देता है।

🔥 नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति हैलोऐरीन्स की कम क्रियाशीलता के कारण:
1. अनुनाद प्रभाव (Resonance Effect): हैलोजन का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेंजीन वलय के साथ अनुनाद करके C-X आबंध में **आंशिक द्विआबंध (Partial Double Bond)** गुण ला देता है, जिससे इसे तोड़ना कठिन होता है।
2. C-X आबंध में कार्बन का संकरण: हैलोऐरीन में कार्बन **sp² संकरित** होता है (अधिक s-लक्षण), जो इलेक्ट्रॉन को अधिक मजबूती से बाँधे रखता है।
3. फ़ेनिल धनायन का अस्थायित्व: स्व-आयनन द्वारा बना फ़ेनिल धनायन (Phenyl cation) अनुनाद द्वारा स्थाई नहीं होता।

⚡ 2. इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन एवं धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ

हैलोजन परमाणु ऑर्थो तथा पैरा-निर्देशक (o, p-directing) होता है, अतः आने वाला इलेक्ट्रॉनरागी ऑर्थो तथा पैरा स्थिति पर जुड़ता है (पैरा-उत्पाद मुख्य होता है)।

1. वुर्ट्ज़-फिटिग अभिक्रिया (Wurtz-Fittig):
ऐल्किल हैलाइड व एराइल हैलाइड का मिश्रण शुष्क ईथर में सोडियम के साथ क्रिया करके ऐल्किल बेंजीन बनाता है:
Ar-X + 2Na + R-X → Ar-R + 2NaX (उदा. टॉल्यूइन बनना)
2. फिटिग अभिक्रिया (Fittig Reaction):
केवल एराइल हैलाइड के दो अणु शुष्क ईथर में सोडियम से क्रिया करके **डाइफ़ेनिल (Diphenyl)** बनाते हैं:
2Ar-X + 2Na → Ar-Ar + 2NaX

🧪 3. महत्वपूर्ण पॉलीहैलोजन यौगिक (Polyhalogen Compounds)

  • 1. क्लोरोफॉर्म (CHCl₃ - ट्राईक्लोरोमेथेन): इसका उपयोग निश्चेतक (Anesthetic) के रूप में होता था। वायु तथा प्रकाश की उपस्थिति में यह अत्यंत विषैली गैस **फॉस्जीन (Phosgene - COCl₂)** बनाता है:
    2CHCl₃ + O₂ (प्रकाश) → 2COCl₂ + 2HCl
  • 2. आयडोफॉर्म (CHI₃): पीले रंग का ठोस, जिसका उपयोग रोगाणुरोधक (Antiseptic) के रूप में होता है। यह CH₃CO- या CH₃CH(OH)- समूह युक्त यौगिकों द्वारा **आयडोफॉर्म परीक्षण** देता है।
  • 3. फ्रिऑन (Freons - CFCs): जैसे CCl₂F₂ (फ्रिऑन-12)। रेफ्रिजरेटर व एसी में प्रशीतक के रूप में प्रयुक्त, जो ओज़ोन परत को क्षति पहुँचाते हैं।
  • 4. DDT (p,p'-डाइक्लोरोडाइफ़ेनिलट्राइक्लोरोऐथेन): एक गैर-बायोडिग्रेडेबल कीटनाशी (Insecticide)।

🔥 बोर्ड परीक्षा विशेष प्रश्न (Board Special Questions)

प्रश्न 1: क्लोरोफॉर्म को रंगीन/काँच की बोतलों में मुँह तक भरकर क्यों रखा जाता है?
उत्तर: क्योंकि क्लोरोफॉर्म सूर्य के प्रकाश व वायु की उपस्थिति में धीरे-धीरे ऑक्सीकृत होकर अत्यंत विषैली गैस **फॉस्जीन (COCl₂)** में बदल जाता है। फॉस्जीन बनने से रोकने हेतु 1% एथिल ऐल्कोहॉल (C₂H₅OH) भी मिलाया जाता है जो विषैली फॉस्जीन को विषहीन डाइएथिल कार्बोनेट में बदल देता है।
प्रश्न 2: सैंडमायर (Sandmeyer) एवं गटरमैन (Gattermann) अभिक्रिया में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: बेंजीन डाइऐजोनियम क्लोराइड से क्लोरोबेंजीन बनाते समय यदि Cu₂Cl₂/HCl लें तो **सैंडमायर अभिक्रिया** तथा यदि कॉपर चूर्ण (Cu dust/HCl) लें तो इसे **गटरमैन अभिक्रिया** कहते हैं।
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