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कक्षा-10 (हिन्दी) - काव्य खण्ड : Chapter-1 - सूरदास — पद

📚 सूरदास — पद

UP Board कक्षा 10 हिन्दी | काव्य-खंड | सत्र 2026–27

पूर्ण समाधान • संदर्भ • प्रसंग • भावार्थ • शब्दार्थ • काव्य-सौन्दर्य

📌 परीक्षा के लिए विशेष: इस अध्याय में सूरदास के पदों के माध्यम से श्रीकृष्ण की भक्ति, बाल-लीला, वात्सल्य, गोपियों का प्रेम-विरह तथा सगुण-निर्गुण भक्ति का विवेचन किया गया है।

🌟 कवि-परिचय — महाकवि सूरदास

जीवन-परिचय

सूरदास हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण कृष्णभक्ति शाखा के महानतम कवियों में गिने जाते हैं। उनकी कविता में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, गोपियों के प्रेम-विरह, यशोदा के वात्सल्य तथा कृष्ण-भक्ति का अत्यन्त हृदयस्पर्शी चित्रण मिलता है।

सूरदास के जन्मस्थान और जन्म-वर्ष के संबंध में विद्वानों में पूर्ण एकमत नहीं है। प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म लगभग 1478 ई. में आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता के आसपास माना जाता है। कुछ विद्वान सीही ग्राम को भी उनका जन्मस्थान मानते हैं।

माता-पिता एवं परिवार

सूरदास के माता-पिता के संबंध में प्रामाणिक ऐतिहासिक जानकारी बहुत सीमित है। परंपरागत स्रोतों में उनके पिता का नाम रामदास बताया जाता है। उनकी माता के नाम के संबंध में निश्चित और सर्वमान्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए बोर्ड परीक्षा में माता का नाम निश्चित तथ्य के रूप में लिखने से बचना उचित है।

शिक्षा-दीक्षा एवं गुरु

सूरदास की औपचारिक शिक्षा के संबंध में निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। उनका आध्यात्मिक विकास भक्ति-साधना और सत्संग के माध्यम से हुआ। परंपरा के अनुसार वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के संपर्क में आए और उनसे कृष्ण-भक्ति की प्रेरणा प्राप्त की। वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग से उनका संबंध माना जाता है।

सूरदास ने कृष्ण की लीलाओं का गायन किया और बाद में वे अष्टछाप के प्रमुख कृष्णभक्त कवियों में प्रतिष्ठित हुए।

मृत्यु

प्रचलित मत के अनुसार सूरदास का निधन लगभग 1583 ई. में गोवर्धन के निकट पारसोली में हुआ माना जाता है।

प्रमुख रचनाएँ

रचना संक्षिप्त परिचय
सूरसागर श्रीकृष्ण की बाल-लीला, गोपी-प्रेम, विरह तथा कृष्ण-भक्ति का अत्यन्त प्रसिद्ध काव्य-संग्रह।
सूर-सारावली भक्ति और कृष्ण-लीला से संबंधित पदों का महत्वपूर्ण संग्रह।
साहित्य-लहरी अलंकार, काव्य-विचार तथा भक्ति से संबंधित पदों का संग्रह।

साहित्यिक विशेषताएँ

  • कृष्णभक्ति की प्रधानता।
  • बाल-लीलाओं का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण।
  • वात्सल्य भाव की प्रभावशाली अभिव्यक्ति।
  • गोपियों के प्रेम और विरह का मनोवैज्ञानिक चित्रण।
  • ब्रजभाषा का मधुर और सरस प्रयोग।
  • गीतात्मक एवं गेय पदों की प्रधानता।
  • अनुप्रास, रूपक, उपमा तथा पुनरुक्तिप्रकाश आदि अलंकारों का प्रयोग।

साहित्य में स्थान

सूरदास को हिन्दी साहित्य का महान कृष्णभक्त कवि माना जाता है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने श्रीकृष्ण के बाल-रूप, मानवीय भावनाओं और भक्त-भगवान के संबंध को अत्यन्त जीवंत बना दिया।

⭐ बोर्ड परीक्षा में याद रखें:
सूरदास — भक्तिकाल — सगुण कृष्णभक्ति — ब्रजभाषा — सूरसागर, सूर-सारावली, साहित्य-लहरी।

📖 पद 1 — श्रीकृष्ण के चरणों की महिमा

चरन-कमल बंद हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै, अंधे कौ सब कुछ दरसाई॥
बहिरौ सुनै, गैंग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंद तिहिं पाई॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
हरि राई = श्रीकृष्ण | पंगु = लँगड़ा | गिरि = पर्वत | लंधै = लाँघ लेता है | बहिरौ = बहरा | गैंग/गूंग = बोलने में असमर्थ | रंक = निर्धन | छत्र = राजचिह्न | करुनामय = दयालु
📌 संदर्भ: प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से संकलित है। इसमें कवि ने श्रीकृष्ण की महिमा और उनके चरणों की शक्ति का वर्णन किया है।
📌 प्रसंग: सूरदास श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की वंदना करते हुए बताते हैं कि भगवान की कृपा से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं।
📝 सरल भावार्थ: सूरदास श्रीकृष्ण के कमल के समान सुंदर चरणों की वंदना करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान की कृपा इतनी शक्तिशाली है कि लँगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को पार कर सकता है, अंधे को सब कुछ दिखाई देने लगता है, बहरा सुनने लगता है और गूँगा बोलने लगता है। निर्धन व्यक्ति भी भगवान की कृपा से सम्मान और समृद्धि प्राप्त कर सकता है। इसलिए सूरदास ऐसे दयालु भगवान के चरणों की बार-बार वंदना करते हैं।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — भक्ति रस
  • भाषा — ब्रजभाषा
  • शैली — मुक्तक
  • छंद — गेय पद
  • गुण — प्रसाद
  • ‘चरन-कमल’ में रूपक अलंकार।
  • अन्य स्थानों पर अनुप्रास अलंकार का सौन्दर्य।

📖 पद 2 — निर्गुण ब्रह्म और सगुण भक्ति

अबिगत-गति कछु कहत न आवै।
ज्यौं गूंगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै॥
परम स्वाद सबही सु निरंतर, अमित तोष उपजावै।
मन-बानी कौं अगम-अगोचर, सो जानैं जो पावै॥
रूप-रेख-गुन जाति-जुगति-बिनु, निरालंब कित धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातें, सूर सगुन-पद गावै॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
अबिगत = निर्गुण/निराकार ब्रह्म | गति = अवस्था | अंतरगत = हृदय में स्थित | तोष = संतोष | अगम = जिसे जाना कठिन हो | अगोचर = इन्द्रियों से परे | रूप-रेख = आकार-प्रकार | जुगति = उपाय | निरालंब = बिना आधार के
📌 संदर्भ: प्रस्तुत पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से संकलित है।
📌 प्रसंग: कवि निर्गुण ब्रह्म की उपासना की कठिनाई बताते हुए सगुण श्रीकृष्ण की भक्ति को अधिक सहज और ग्रहणीय बताते हैं।
📝 सरल भावार्थ: सूरदास कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म का स्वरूप और उसकी अवस्था शब्दों में बताना कठिन है। उसका अनुभव ऐसा है जैसे किसी गूँगे व्यक्ति को मीठा फल खाने पर उसके स्वाद का अनुभव तो हो, लेकिन वह उसे शब्दों में बता न सके। निर्गुण ब्रह्म का आनंद अत्यन्त गहरा है, लेकिन वह इन्द्रियों और सामान्य बुद्धि की पहुँच से बाहर है। उसका कोई निश्चित रूप, आकार या विशेषता नहीं बताई जा सकती। इसलिए सूरदास ने विचार किया कि साकार और सगुण श्रीकृष्ण की लीलाओं का गायन करना अधिक सरल और भक्तिपूर्ण मार्ग है।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — भक्ति तथा शान्त
  • भाषा — साहित्यिक ब्रजभाषा
  • छंद — गेय पद
  • ‘अगम-अगोचर’ में अनुप्रास।
  • ‘गूँगे मीठे फल’ के उदाहरण में दृष्टान्त का सौन्दर्य।
  • सगुण भक्ति को सरल तथा निर्गुण साधना को कठिन बताया गया है।

📖 पद 3 — बालकृष्ण की घुटुरुनि चाल

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिम्ब पकरिबैं धावत॥
कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरने चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत॥
कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति॥
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु को दूध पियावति॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
किलकत = किलकारी मारते हुए | कान्ह = कृष्ण | घुटुरुवनि = घुटनों के बल चलना | मनिमय = मणियों से युक्त | कनक = सोना | बिम्ब = प्रतिबिम्ब | दतियाँ = छोटे दाँत | कर-पग = हाथ-पैर | बसुधा = पृथ्वी | बैठकी = आसन
📌 संदर्भ: यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से लिया गया है।
📌 प्रसंग: इस पद में कवि ने बालक श्रीकृष्ण की मनोहर बाल-लीलाओं और माता यशोदा के वात्सल्य का चित्रण किया है।
📝 सरल भावार्थ: बालक श्रीकृष्ण घुटनों के बल चलते हुए किलकारियाँ मार रहे हैं। नन्द के मणियों से जड़े सुनहरे आँगन में उन्हें अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देता है और वे उसे पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। कभी वे अपनी ही छाया को पकड़ने का प्रयास करते हैं। हँसते समय उनके छोटे-छोटे दाँत अत्यन्त सुंदर लगते हैं। उनके हाथ-पैरों की छाया स्वर्णिम भूमि पर ऐसी लगती है मानो पृथ्वी ने प्रत्येक स्थान पर उनके लिए कमल के आसन सजा दिए हों। यशोदा बालकृष्ण की इन मनमोहक बाल-लीलाओं को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होती हैं और उन्हें आँचल में छिपाकर दूध पिलाती हैं।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — वात्सल्य रस
  • भाषा — मधुर एवं सरस ब्रजभाषा
  • छंद — गेय पद
  • ‘किलकत कान्ह’, ‘दै दतियाँ’ में अनुप्रास।
  • ‘करि-करि’, ‘पुनि-पुनि’ में पुनरुक्तिप्रकाश।
  • ‘कमल बैठकी’ में रूपक का सौन्दर्य।

📖 पद 4 — कृष्ण का बाल-हठ

मैं अपनी सब गाई चरैहौं।
प्रात होत बल कैं संग जैहौं, तेरे कहैं न रैहौं॥
ग्वाल बाल गाइनि के भीतर, नैकहुँ डर नहिं लागत।
आजु न सोव नंद-दुहाई, रैनि रहौंगौ जागत॥
और ग्वाल सब गाई चरैहैं, मैं घर बैठो रैहौं।
सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब, प्रात जान मैं दैहौं॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
गाई = गायें | चरैहौं = चराऊँगा | जैहौं = जाऊँगा | गाइनि = गायों | नैकहुँ = तनिक भी | नंद-दुहाई = नन्द की कसम | रैनि = रात | सोइ रहौ = सो जाओ
📌 संदर्भ: यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से संकलित है।
📌 प्रसंग: बालकृष्ण अपनी माता यशोदा से गाय चराने वन जाने की जिद करते हैं। यहाँ कृष्ण का स्वाभाविक बाल-हठ और यशोदा का वात्सल्य दिखाई देता है।
📝 सरल भावार्थ: कृष्ण अपनी माता से कहते हैं कि वे भी अपनी सभी गायों को चराने जाएँगे। सुबह होते ही बलराम के साथ वन में जाएँगे और माता के रोकने पर भी नहीं रुकेंगे। उन्हें ग्वाल-बालों और गायों के बीच रहने में बिल्कुल डर नहीं लगता। वे कहते हैं कि आज रात भी वे नहीं सोएँगे, ताकि सुबह समय पर उठकर गाय चराने जा सकें। वे यह भी कहते हैं कि जब सभी ग्वाल-बाल गाय चराने जाएँगे तो वे घर में अकेले कैसे बैठ सकते हैं। अंत में यशोदा उन्हें समझाकर कहती हैं कि अभी सो जाओ, सुबह तुम्हें गाय चराने जाने दूँगी।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — वात्सल्य
  • भाषा — सरल, सरस ब्रजभाषा
  • छंद — गेय पद
  • बाल-हठ का स्वाभाविक चित्रण।
  • अनुप्रास अलंकार का प्रयोग।

📖 पद 5 — कृष्ण की ग्वाल-बालों से शिकायत

मैया हौं न चरैहौं गाइ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों, मेरे पाईं पिराइ॥
जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंहँ दिवाइ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ॥
मैं पठेवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ।
सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
हौं = मैं | सिगरे = सभी | घिरावत = घेरने को कहते हैं | पाईं = पैरों में | पिराइ = पीड़ा | पत्याहि = विश्वास करो | बलदाउ = बलराम | सौंह = कसम | रिसाइ = क्रोधित होकर | लरिका = बालक | रिंगाइ = दौड़ाकर
📌 संदर्भ: प्रस्तुत पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से संकलित है।
📌 प्रसंग: कृष्ण अपनी माता यशोदा से शिकायत करते हैं कि ग्वाल-बाल उन्हें बहुत दौड़ाते हैं, इसलिए वे अब गाय चराने नहीं जाना चाहते।
📝 सरल भावार्थ: कृष्ण अपनी माता से कहते हैं कि वे अब गाय चराने नहीं जाएँगे। सभी ग्वाल-बाल उनसे ही गायों को घेरने के लिए कहते हैं और उन्हें इधर-उधर बहुत दौड़ाते हैं, जिससे उनके पैरों में दर्द होने लगा है। कृष्ण अपनी बात को सत्य सिद्ध करने के लिए बलराम की कसम दिलाने की बात कहते हैं। यह सुनकर यशोदा को ग्वाल-बालों पर क्रोध आता है। वे कहती हैं कि मैं तो कृष्ण को मन बहलाने के लिए गाय चराने भेजती हूँ, लेकिन ये बालक उसे बहुत दौड़ाकर परेशान करते हैं।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — वात्सल्य
  • भाषा — सरल एवं स्वाभाविक ब्रजभाषा
  • बाल-मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण।
  • ‘पाईं पिराइ’ तथा ‘सूर स्याम’ में अनुप्रास।
  • गुण — माधुर्य।

📖 पद 6 — मुरली के प्रति गोपियों की ईर्ष्या

सखी री, मुरली लीजै चोरि।
जिनि गुपाल कीन्हें अपनें बस, प्रीति सबनि की तोरि॥
छिन इक घर-भीतर, निसि-बासर, धरतन कबहूँ छोरि।
कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहूँ खोंसत जोरि॥
ना जानौं कछु मेलि मोहिनी, राखे अँग-अँग भोरि।
सूरदास प्रभु को मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
छिन इक = एक क्षण | निसि-बासर = रात-दिन | कर = हाथ | अधरनि = होंठों पर | कटि = कमर | मोहिनी = आकर्षित करने वाली शक्ति | राग = प्रेम
📌 संदर्भ: यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से संकलित है।
📌 प्रसंग: गोपियाँ कृष्ण की मुरली से ईर्ष्या करती हैं क्योंकि कृष्ण हर समय मुरली को अपने पास रखते हैं और उसकी धुन में खोए रहते हैं।
📝 सरल भावार्थ: एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हमें कृष्ण की मुरली चुरा लेनी चाहिए। इस मुरली ने कृष्ण को अपने वश में कर लिया है और कृष्ण ने भी उसके कारण हम सभी को भुला दिया है। कृष्ण मुरली को एक क्षण के लिए भी अपने से अलग नहीं करते। कभी हाथ में रखते हैं, कभी होंठों पर और कभी कमर में लगा लेते हैं। गोपियों को समझ नहीं आता कि मुरली ने ऐसा कौन-सा जादू कर दिया है कि कृष्ण उसके वश में हो गए हैं। सूरदास कहते हैं कि मुरली ने कृष्ण के मन को प्रेम की डोरी से बाँध रखा है।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — शृंगार रस
  • भाव — ईर्ष्या और प्रेम
  • भाषा — सरल, सरस ब्रजभाषा
  • ‘राग की डोरि’ में रूपक।
  • अनुप्रास अलंकार का प्रयोग।
  • शैली — मुक्तक एवं गीतात्मक।

📖 पद 7 — कृष्ण को ब्रज की स्मृति

ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
बृन्दावन गोकुल बने उपबन, सघन कुंज की छाँहीं॥
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत।
माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत॥
गोपी ग्वाले बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात।
सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनसौं हित जदु-तात॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
बिसरत = भूलना | सघन = घना | कुंज = वृक्षों का समूह | छाँहीं = छाया | दह्यौ = दही | हित = प्रेम | सिरात = बीतता है | जदु-तात = कृष्ण
📌 संदर्भ: यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से संकलित है।
📌 प्रसंग: कृष्ण मथुरा में रहकर उद्धव से अपने ब्रज और वहाँ के प्रियजनों की स्मृतियाँ साझा करते हैं।
📝 सरल भावार्थ: कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि उन्हें ब्रज कभी नहीं भूलता। वृन्दावन और गोकुल के वन-उपवन तथा घने कुंजों की छाया उन्हें बार-बार याद आती है। उन्हें माता यशोदा और नन्द बाबा का प्रेम याद आता है, जो उन्हें मक्खन, रोटी और दही बड़े स्नेह से खिलाते थे। उन्हें गोपियों और ग्वाल-बालों के साथ खेलना और हँसते हुए दिन बिताना भी याद आता है। सूरदास ऐसे ब्रजवासियों को धन्य मानते हैं, जिनसे कृष्ण को इतना प्रेम है।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — शृंगार का वियोग पक्ष
  • भाषा — सरल, सरस ब्रजभाषा
  • कृष्ण के मानवीय एवं भावुक रूप का चित्रण।
  • ‘ब्रज बिसरत’, ‘बृन्दावन गोकुल’ आदि में अनुप्रास।
  • गुण — माधुर्य।

📖 पद 8 — गोपियों का एकनिष्ठ प्रेम

ऊधौ मन न भये दस बीस।
एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, कौ अवराधै ईस॥
इंद्री सिंथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्याम सुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूर हमारें नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
हुतौ = था | अवराधै = आराधना करे | इंद्री = इन्द्रियाँ | सिंथिल = शिथिल/निष्क्रिय | केसव = श्रीकृष्ण | सीस = सिर | बरीस = वर्ष | सखा = मित्र | जोग = योग | जगदीस = जगदीश्वर
📌 संदर्भ: प्रस्तुत पद सूरदास के ‘सूरसागर’ के भ्रमर-गीत प्रसंग से संबंधित है।
📌 प्रसंग: श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद गोपियाँ विरह से व्याकुल हैं। उद्धव उन्हें योग और निर्गुण भक्ति का संदेश देते हैं, जिसे गोपियाँ अपने प्रेम के कारण स्वीकार नहीं कर पातीं।
📝 सरल भावार्थ: गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। हमारे पास केवल एक मन था और वह भी श्रीकृष्ण के साथ चला गया। अब हम उसी मन के बिना निर्गुण ब्रह्म की आराधना कैसे करें? कृष्ण के बिना हमारी इन्द्रियाँ भी निष्क्रिय हो गई हैं और हमारी स्थिति सिर के बिना शरीर जैसी हो गई है। हमारे शरीर में साँस केवल इस आशा से चल रही है कि कृष्ण एक दिन लौटकर आएँगे। यदि कृष्ण के लौटने की आशा बनी रहे तो हम करोड़ों वर्षों तक जीवित रह सकती हैं। गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि तुम कृष्ण के मित्र हो और योग के ज्ञाता हो, इसलिए हमारा कृष्ण से मिलन करा दो। कृष्ण के अलावा हमारा कोई दूसरा आराध्य नहीं है।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — वियोग शृंगार
  • भाषा — मधुर ब्रजभाषा
  • ‘ज्यौं देही बिनु सीस’ में उपमा।
  • ‘सखा स्याम सुन्दर’ में अनुप्रास।
  • ‘जोग’ शब्द में श्लेष का सौन्दर्य।
  • एकनिष्ठ प्रेम की अत्यन्त मार्मिक अभिव्यक्ति।

📖 पद 9 — उद्धव के ज्ञान पर गोपियों का व्यंग्य

ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने।
स्याम तुमहिं स्याँ कौं नहिं पठयौ, तुम हौ बीच भुलाने॥
ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौ, बात कहत न लजाने।
बड़े लोग न बिबेक तुम्हारे, ऐसे भए अयाने॥
हमसौं कही लई हम सहि कै, जिय गुनि लेह सयाने।
कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने॥
साँच कहाँ तुमक अपनी सौं, बूझति बात निदाने।
सूर स्याम जब तुमहिं पठायौ, तब नैकहुँ मुसकाने॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
अयाने = अज्ञानी | बिबेक = विवेक | अबला = स्त्री | दिगंबर = जिसके वस्त्र दिशाएँ हों | मष्ट करौ = चुप हो जाओ | निदाने = अंत में | नैकहुँ = थोड़ा भी | मुसकाने = मुस्कराए
📌 संदर्भ: यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से संकलित है।
📌 प्रसंग: उद्धव जब गोपियों को निर्गुण योग का संदेश देते हैं तो गोपियाँ उनके तर्कों का उत्तर व्यंग्य और तर्कपूर्ण ढंग से देती हैं।
📝 सरल भावार्थ: गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि अब हम तुम्हें पहचान गई हैं। श्याम ने तुम्हें हमारे पास नहीं भेजा होगा; शायद तुम स्वयं रास्ता भटककर यहाँ आ गए हो। तुम ब्रज की प्रेममयी स्त्रियों से योग की बात कर रहे हो और तुम्हें इसमें जरा भी लज्जा नहीं आती। तुम अपने आपको बहुत ज्ञानी समझते हो, लेकिन तुम्हारी बातों में विवेक दिखाई नहीं देता। गोपियाँ कहती हैं कि हमने तुम्हारी बात सुन ली और सहन भी कर ली, पर अब किसी दूसरी गोपी से ऐसी बात मत कहना। अंत में वे व्यंग्यपूर्वक पूछती हैं कि जब कृष्ण ने तुम्हें भेजा था तो क्या वे मुस्कराए नहीं थे? अर्थात् कृष्ण ने शायद तुम्हारे साथ मजाक किया है।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — शृंगार
  • भाषा — सरल एवं सरस ब्रजभाषा
  • गोपियों की तर्कशक्ति और व्यंग्य-बुद्धि का चित्रण।
  • ‘दसा दिगंबर’ में अनुप्रास।
  • व्यंजना शब्दशक्ति की प्रधानता।

📖 पद 10 — निर्गुण ब्रह्म पर गोपियों के प्रश्न

निरगुन कौन देस कौ बासी?
मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बुझति साँच न हाँसी॥
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी?
कैसे बरन, भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी?
पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जौ रे करैगौ गाँसी।
सुनत मौन है रह्यौ बावरी, सूर सबै मति नासी॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
निरगुन = निर्गुण ब्रह्म | मधुकर = भ्रमर; यहाँ उद्धव के लिए | सौंह = शपथ | साँच = सत्य | जनक = पिता | जननी = माता | बरन = रंग | भेष = वेश | अभिलाषी = इच्छुक | गाँसी = छल-कपट | बावरी = बावला | मति नासी = बुद्धि नष्ट होना
📌 संदर्भ: प्रस्तुत पद सूरदास के ‘सूरसागर’ के भ्रमर-गीत प्रसंग से संबंधित है।
📌 प्रसंग: गोपियाँ उद्धव द्वारा बताए गए निर्गुण ब्रह्म के विषय में व्यंग्यपूर्ण प्रश्न करती हैं और सगुण कृष्ण-भक्ति की श्रेष्ठता को स्पष्ट करती हैं।
📝 सरल भावार्थ: गोपियाँ उद्धव से पूछती हैं कि तुम्हारा निर्गुण ब्रह्म आखिर किस देश में रहता है। वे कहती हैं कि हम मजाक नहीं कर रही हैं, सच-सच बताओ। उसके पिता कौन हैं, माता कौन हैं, उसकी पत्नी कौन है और उसकी दासी कौन है? उसका रंग कैसा है, वेश कैसा है और उसे कौन-सा रस पसंद है? गोपियाँ चेतावनी देती हैं कि यदि तुम छल-कपट करोगे तो उसका फल तुम्हें मिलेगा। उनके ऐसे तर्कपूर्ण प्रश्न सुनकर उद्धव मौन हो जाते हैं और उनका ज्ञान-गर्व समाप्त हो जाता है।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — वियोग शृंगार तथा हास्य
  • भाषा — सरल ब्रजभाषा
  • निर्गुण भक्ति पर व्यंग्यात्मक प्रश्न।
  • ‘मधुकर’ के माध्यम से अन्योक्ति।
  • अनुप्रास अलंकार का प्रयोग।
  • गोपियों की तर्कशीलता का सुंदर चित्रण।

📖 पद 11 — यशोदा का देवकी के नाम संदेश

सँदेसौ देवकी सौं कहियौ।
हौं तो धाइ तिहारे सुत की, दया करत ही रहियौ॥
जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै।
प्रात होत मेरे लाल लडैडौँ, माखन रोटी भावै॥
तेल उबटनौ अरु तातो जल, ताहि देखि भजि जाते।
जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते॥
सूर पथिक सुन मोहिं रैनि दिन, बढ्यौ रहत उर सोच।
मेरौ अलक लडैतो मोहन, हैहै करत सँकोच॥
🔤 कठिन शब्दार्थ:
सँदेसौ = संदेश | धाइ = धाय/पालन करने वाली | टेव = आदत | लडैडौँ = लाड़ला | तातो = गर्म | भजि जाते = भाग जाते | क्रम-क्रम = धीरे-धीरे | न्हाते = स्नान करते | पथिक = यात्री | रैनि = रात | उर = हृदय | सोच = चिंता | अलक = प्यारा/दुलारा
📌 संदर्भ: यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से संकलित है।
📌 प्रसंग: कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद यशोदा अत्यन्त दुखी हैं। वे एक पथिक के माध्यम से देवकी के पास अपने मन की बात भेजती हैं।
📝 सरल भावार्थ: यशोदा एक यात्री से कहती हैं कि देवकी से मेरा संदेश कहना। मैं तुम्हारे पुत्र की धाय मात्र हूँ और उसकी देखभाल करती रही हूँ। तुम उसके स्वभाव और आदतों को जानती ही हो, फिर भी मेरा मन कुछ बातें कहने के लिए व्याकुल है। सुबह होते ही मेरा लाड़ला माखन और रोटी पसंद करता था। उसे तेल, उबटन और गर्म पानी पसंद नहीं था; उन्हें देखकर वह भाग जाता था। वह जो-जो माँगता, मैं उसे वही देती थी और फिर वह धीरे-धीरे स्नान करता था। यशोदा कहती हैं कि अब मुझे रात-दिन यही चिंता रहती है कि मेरा लाड़ला मोहन मथुरा में किसी वस्तु की इच्छा होने पर संकोच तो नहीं करता होगा।
🎨 काव्य-सौन्दर्य:
  • रस — वात्सल्य
  • भाषा — सरल, सरस ब्रजभाषा
  • यशोदा के मातृ-वात्सल्य का मार्मिक चित्रण।
  • बाल-मनोविज्ञान की सुंदर अभिव्यक्ति।
  • ‘लाल लड़ैतो’ में अनुप्रास।
  • ‘जोइ-जोइ’, ‘सोइ-सोइ’, ‘क्रम-क्रम’ में पुनरुक्तिप्रकाश।

📝 अध्याय का संक्षिप्त सार

सूरदास के इन पदों में श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों का अत्यन्त सुंदर चित्रण हुआ है। आरंभ में कवि श्रीकृष्ण के चरणों की महिमा का वर्णन करते हुए उनकी कृपा को सर्वशक्तिमान बताते हैं। इसके बाद निर्गुण ब्रह्म की कठिन उपासना की तुलना सगुण कृष्ण-भक्ति की सरलता से की गई है।

इसके बाद बालकृष्ण की मनोहर बाल-लीलाओं, गाय चराने की जिद और ग्वाल-बालों की शिकायत का चित्रण मिलता है। इन पदों में यशोदा का वात्सल्य और कृष्ण का बाल-मनोविज्ञान विशेष रूप से दिखाई देता है।

आगे गोपियों के प्रेम, मुरली के प्रति उनकी ईर्ष्या और कृष्ण-विरह का वर्णन है। उद्धव के निर्गुण योग के संदेश के सामने गोपियाँ अपने एकनिष्ठ कृष्ण-प्रेम को सर्वोच्च मानती हैं। अंत में यशोदा की मातृ-वेदना और कृष्ण के प्रति उनके असीम वात्सल्य का अत्यन्त मार्मिक चित्रण मिलता है।

⭐ बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय उत्तर
कवि सूरदास
काल भक्तिकाल
भक्ति-धारा सगुण कृष्णभक्ति
भाषा ब्रजभाषा
प्रमुख रचनाएँ सूरसागर, सूर-सारावली, साहित्य-लहरी
मुख्य रस भक्ति, वात्सल्य तथा वियोग शृंगार
मुख्य छंद गेय पद
प्रमुख अलंकार अनुप्रास, रूपक, उपमा, पुनरुक्तिप्रकाश, अन्योक्ति आदि

🎯 बोर्ड परीक्षा के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. सूरदास का जीवन-परिचय एवं उनकी प्रमुख रचनाओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: सूरदास भक्तिकाल की सगुण कृष्णभक्ति शाखा के महान कवि थे। उनके जन्मस्थान और जन्म-वर्ष के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म लगभग 1478 ई. में रुनकता के आसपास माना जाता है। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के संपर्क में आए और कृष्णभक्ति से गहराई से जुड़े। वे अष्टछाप के प्रमुख कवियों में माने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ सूरसागर, सूर-सारावली और साहित्य-लहरी हैं। उनकी भाषा ब्रजभाषा तथा प्रमुख विषय कृष्ण की बाल-लीला, गोपी-प्रेम, विरह और वात्सल्य हैं।

प्रश्न 2. सूरदास ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना को कठिन क्यों माना?

उत्तर: निर्गुण ब्रह्म निराकार और इन्द्रियों से परे है। उसका कोई निश्चित रूप, आकार या प्रत्यक्ष आधार नहीं है। इसलिए उसकी अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। सूरदास ने इसे गूँगे व्यक्ति द्वारा मीठे फल का स्वाद बताने में असमर्थता से समझाया है।

प्रश्न 3. बालक कृष्ण की किन-किन बाल-लीलाओं का वर्णन हुआ है?

उत्तर: बालक कृष्ण का घुटनों के बल चलना, अपनी छाया और प्रतिबिम्ब को पकड़ने का प्रयास करना, किलकारी मारना, छोटे-छोटे दाँत दिखाकर हँसना, गाय चराने की जिद करना तथा ग्वाल-बालों की शिकायत करना आदि बाल-लीलाओं का वर्णन हुआ है।

प्रश्न 4. गोपियाँ मुरली से क्यों ईर्ष्या करती हैं?

उत्तर: गोपियों को लगता है कि कृष्ण मुरली को हर समय अपने पास रखते हैं। कभी हाथ में, कभी होंठों पर और कभी कमर में रखते हैं। उन्हें लगता है कि मुरली ने कृष्ण को अपने वश में कर लिया है और इसी कारण कृष्ण उन्हें भूल गए हैं। इसलिए गोपियाँ मुरली को अपनी प्रतिद्वंद्वी मानकर उससे ईर्ष्या करती हैं।

प्रश्न 5. ‘ऊधौ मन न भये दस बीस’ का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: गोपियाँ कहती हैं कि हमारे पास अनेक मन नहीं हैं। हमारे पास केवल एक मन था और वह श्रीकृष्ण के साथ चला गया। इसलिए कृष्ण-विरह में हमारे पास निर्गुण ब्रह्म की आराधना करने के लिए मन ही नहीं बचा है। यह पंक्ति गोपियों के कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ प्रेम को व्यक्त करती है।

प्रश्न 6. ‘निरगुन कौन देस कौ बासी?’ में गोपियों का कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?

उत्तर: इस पद में गोपियों का व्यंग्य, तर्क और निर्गुण ब्रह्म के प्रति उनकी अनास्था व्यक्त हुई है। वे उद्धव से निर्गुण ब्रह्म का रूप, परिवार और निवास आदि के बारे में प्रश्न पूछकर उसकी अमूर्त प्रकृति पर व्यंग्य करती हैं।

प्रश्न 7. ‘सँदेसौ देवकी सौं कहियौ’ पद का मुख्य भाव क्या है?

उत्तर: इस पद का मुख्य भाव यशोदा का वात्सल्य और कृष्ण-वियोग की मातृ-वेदना है। यशोदा कृष्ण की छोटी-छोटी आदतों को याद करते हुए चिंतित हैं कि मथुरा में कृष्ण अपनी आवश्यकताएँ संकोच के कारण ठीक से बता भी पाते होंगे या नहीं।

🎭 पदों में प्रमुख रस

पद प्रमुख रस
चरन-कमल बंद हरि राई भक्ति
अबिगत-गति कछु कहत न आवै भक्ति / शान्त
किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत वात्सल्य
मैं अपनी सब गाई चरैहौं वात्सल्य
मैया हौं न चरैहौं गाइ वात्सल्य
सखी री, मुरली लीजै चोरि शृंगार
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं वियोग शृंगार
ऊधौ मन न भये दस बीस वियोग शृंगार
ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने शृंगार / व्यंग्य
निरगुन कौन देस कौ बासी वियोग शृंगार एवं हास्य
सँदेसौ देवकी सौं कहियौ वात्सल्य

✨ महत्वपूर्ण अलंकार

पंक्ति अलंकार
चरन-कमल बंद हरि राई रूपक
किलकत कान्ह अनुप्रास
प्रतिपद प्रतिमनि अनुप्रास
करि-करि, पुनि-पुनि पुनरुक्तिप्रकाश
कमल बैठकी रूपक
ज्यौं देही बिनु सीस उपमा
मधुकर अन्योक्ति
राग की डोरि रूपक

📚 शब्द-वर्ग — महत्वपूर्ण

तत्सम तद्भव देशज
पंगु, गृह, करि, जननी, बिम्ब, यति, विधु चरन, अँचरा, नैन, पानि, सखा, जोग, इंद्री कान्ह, साँच, छोटा, टेव, ठाढ़े आदि

⚡ 1 मिनट में पूरा अध्याय दोहराएँ

सूरदास भक्तिकाल सगुण कृष्णभक्ति ब्रजभाषा सूरसागर बाल-लीला वात्सल्य गोपियों का प्रेम विरह उद्धव सगुण-निर्गुण

📌 सबसे महत्वपूर्ण:
1. सूरदास का जीवन-परिचय एवं रचनाएँ
2. सगुण और निर्गुण भक्ति का अंतर
3. कृष्ण की बाल-लीला
4. गोपियों का कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ प्रेम
5. मुरली के प्रति गोपियों की ईर्ष्या
6. उद्धव और गोपियों का संवाद
7. यशोदा का वात्सल्य
📚 पाठ्यक्रम संदर्भ: यह सामग्री UP Board कक्षा 10 हिन्दी के 2026–27 पाठ्यक्रम में निर्धारित “सूरदास — पद” के आधार पर तैयार की गई है।
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